Saturday, 9 November 2013

माधव शुक्ल ‘‘मनोज‘‘ के काव्य पर एक दृष्टि-एक-लघु शॊध प्रबंध,

 माधव शुक्ल 'मनोज'
 माधव शुक्ल ‘‘मनोज‘‘ के काव्य पर एक दृष्टि
लघु शोध प्रबंध-एक-अतुल कुमार श्रीवास्तव-सागर

आधुनिक बुन्देली कविता के सन्दर्भ मैं माधव शुक्ल 'मनोज' के काव्य का अनुशीलन



माधव शुक्ल ‘‘मनोज’’ बुन्देली और खड़ी बोली के जनप्रिय कवि है। वे 1947 से कविताएं लिख रहे है खड़ी बोली और बुन्देली में फैला इनका रचना काल पचपन वर्शो से भी अधिक का है। उनका समूचा काव्यसृजन ग्राम्यानुभूति में डूबा हुआ है।
   
जीवन के इस तमस में आस्था का दीप जाने वाले कवि मनोज का जन्म 1 अक्टूबर1930 को  हुआ था। ये संघर्शो में पले बड़े इन्होंने जीवन में कई उतार चढ़ाव देखे, मन में चाह होते हुए भी ये उच्च शिक्षा प्राप्त न कर सके और परिस्थितियों से समझौता कर सागर के परकोटा में किराने की एक छोटी सी दुकान चलाने लगे । कभी शाम को मित्रों के साथ रामायण मंडली में बैठते ओर छोटी मोटी तुकबंदी किया करते और इसी तरह मन में कविता के अंकुर फूटे। उनका कण्ठ भी बड़ा सुरीला था, लोग उन्हें अक्सर गायक के रूप में याद करते थे।
  
   एक बार इन्होंने अपनी कुछ पंक्तियां लिखी थी और मित्रों के आग्रह पर ये सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी से मिलने गये । उन्होंने इनकी बहुत प्रशंसा की व कहा कि आप में जयशंकर प्रसाद की प्रतिभा दिखती है। फिर इसी तरह इन्हें मित्रों एंव अन्य विद्वानों की प्रशंसा मिली एवं इनकी काव्य यात्रा प्रारंभ हुयी। आपका प्रारंभिक कविता संग्रह ‘‘सिकता कण’’ है। यह संग्रह 1952 में प्रकाशित हुआ।

    इनका जन्म व लालन पालन एक कृषक परिवार में होने के कारण उनके ग्रामीण संस्कार गॉवों का सजग चित्रण करते हैं। वही दूसरी ओर मनोज जी बताते है कि जब वह शासकीय प्राथमिक शाला में शिक्षक बने तो गॉव में ज्यादा रहना पड़ और ग्रामीण परिवेश ने इनके मन में गहरी छाप छोडी इसलिए इनकी काव्यधारा में ग्रामीण जीवन की अनुभूतियॉ केन्द्र में है। ग्रामीण जीवन को उन्होंने कल्पना की आंख से नहीं देखा वरन् उसी में डूब कर उनकी अनुभूति ने अभिव्यक्ति पायी है।


    बुन्देली में मनोज जी के समकालीन कई उम्दा कवि हुए किन्तु लोक जीवन को काव्य में उतारने में इन्होंने पूर्ण सफलता प्राप्त की है। उनके समय के कवि अपने घरानों संस्कारों, मान्यताओं एंव सीमाओं के घरे में बैठे रहे, वही मनोज जी ने काव्य के परिवर्तनशील युग की नयी काव्यधारा से सम्बंध स्थापित कर अपनी जागरूकता का प्रमाण दिया। और इसी कारण इनका कृतित्व सर्वाधिक विकसनशील और गतिशील रहा है। माधव शुक्ल ‘‘मनोज‘‘ के अभी तक निम्न कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं -
माधव शुक्ल मनोज 

1.    सिकतागण (1952)
2.    भोर के साथी (1956)
3.    माटी के बोल (1960)
4.    एक नदी कण्ठी सी (1956)
5.    नीला बिरछा (1991)
6.    धुनकी रूई पेट पौआ (1992)
7.    जिन्दगी चंदन बोली है (1993)
8.    जब रास्ता चैराहा पहन लेता है (1997)
9.    मै तुम सब (2000)
10.  एक लॅगोटी बारौ (2001)

माधव शुक्ल ‘‘मनोज‘‘ ने चौका ग्राम मे शिक्षक रहते हुए अपनी काव्य यात्रा प्रारम्भ की इनका पहला काव्य संग्रह ‘‘सिकताकण’’ खड़ी बोली में रचा गया। किन्तु ग्रामीण परिवेश में रहने के कारण इनका मन बुन्देली की तरफ गया और फिर उन्होंने बुन्देली में अद्भुत काव्यधारा की रचना की। ग्रामीण वातावरण काव्य के प्रति मोह उत्पन्न करने में समर्थ रहा । इतना ही क्यों, उनके आस-पास फैली हुई प्राकृतिक छटा भी उनके हृदय में कविता के भाव जगाने में पर्याप्त सफल हुई। उन्हें कविता की प्रेरणा ही प्रकृति से मिली। इस संबंध में उनकी स्वीकारोक्ति भी है कि कविता के लिए ग्राम का परिवेश खेत- खलिहानों ने प्रेरणा का काम किया ।
माधव शुक्ल मनोज का दूसरा काव्य संग्रह 1956 में प्रकाशित हुआ ‘‘भोर के साथी’’ इस संग्रह में रचनाओं की संख्या अधिक नहीं है पर भाषा शैली एंव छन्द विधान के क्षेत्र में नये प्रयोग किये हैं -
    चरवाहे की बजी बंसुरिया जंगल गूंजा रे ।
    गौओ की टोली में जैसे कान्हा गाय रे ।
    यमुना जैसी जंगल मे से नदिया ढुलक चली ।
    हरे पहाड़ों में से रस की धारा छलक चली ।
( भोर के साथी )

‘‘ भोर के साथी’ की भूमि में डॉ रामरतन भटनाकर ने लिखा है कि जनपदीय काव्य लोक गीतों का ऋणी एवं उत्तराधिकारी हैं। उसमें साहित्य चेतना की कमी नहीं है, परन्तु नागरिक संस्कारों से वह अछूता हैं और साहित्यिक परम्परा का निर्वाह उसमें नहीं है। 1936 के बाद काव्य क्षेत्र में ये दो धारायें साथ-साथ चलती हैं। इस संदर्भ में कवि मनोज की यह रचना निःसन्देह अभिनन्दनीय है, इस छोटी सी रचना से भी कवि का प्रगतिशील और प्रयोग रूप स्पश्ट हो जाता है। और उसकी शक्ति का पर्याप्त परिचय होता हैं। कवि अपने नागरिक संस्कारों के प्रति संदेहशील है । वह भाषा शैली, गीत, स्वर, छन्द, विशय और अभिव्यंजना सभी क्षेत्रों सम्बंधी सभी मान्यताओं को त्याग कर संभावनाओं के विशाल सागर में विचरण करता हैं। इस प्रकार उसने अपनी भाव भूमि का विस्तार किया है और नयी पीढ़ी के नये सपनों को लोकवाणी दी है।1

कवि ने गांवों के चित्रों को गॉवों की भाषा में ही सवारा है। उसकी शब्दावली ग्रामीणों की बोलचाल की भाषा है और स्वर लहरी भी प्रेशणीय तथा लोकप्रिय है। गांव के जीवन तत्व और उनके सामाजिक संस्कार कहीं कहीं बड़े मधुर रूपक बॉधते है ‘‘हॅसते ज्वर के कुंज’’ और ‘‘भादों रसिया’’ कविताओं में प्रकृति को मानवीय संस्कारों में बॉध दिया हैं-

प्रीत ज्वार से करें बाजरा, कुटकी ब्याह रचाती हैं।
कचरियॉ का ढोल बजा के,
    बनरी मूग सुनाती हैं।
पास खडा बिरवा बबूल का,
    नये बराती टेर रहा।
उरदा पहुनाई करने को,
    नये संगाती हेर रहा।
ज्वार कुंज के तले बैठ कर
    मंडप नींद रही गोरी ।।
अतुल श्रीवास्तव - सागर 
( हॅसे ज्वार के कुंज, भोर के साथी )

इसी तरह ‘‘ भादो रसिया’’ में भादों का चित्रण करते हुए कवि गाता है-
भादों का है हरा दुपट्टा,
    सिर पर पगिया बादल की ।
आॅखे जूही चमेली जैसी,
    कोरे काली काजल की
सूरज इन्द्र धनुश की,
    रेखा चमक-दमक बिजली जैसी
सॉस नशीली देह सुहानी,
    गेहॅू की कजली जैसी ।
गॉव की पगडण्डी, चरवाहे, सॉझ-सुबह चॉदनी और धूप ये सभी कवि को संवेदना से भर देती है।

म.प्र. के प्रतिनिधि साहित्यकार में टी.दिनकर ने लिखा है कि आम जन की जिन्दगी किन किन परिस्थितियों से गुजरती है इसका चित्रण मानवता के उज्जवल भविष्य के साथ मनोज ने किया हैं। फिर मनोज के मन का कवि इस संदर्भ में पुरानी शब्द योजनाओं को दुहराने वाली काव्य गति से ऊबकर एक छोटे से गॉव में चला जाता हैं, और लोक गीतों की धुनों में झूमता हुआ अपनी भावनाओं को और भी सुन्दर बना देता हैं।2

इस प्रकार कवि मनोज का प्रगतिशील रूप स्पष्ट हो जाता हैं। वे सभी मान्यताओं को त्यागकर संभावनाओं के विशाल संसार में विचरण करता हुआ अपनी भाव भूमिका का विस्तार करते हैं। और नयी पीढ़ी के नये सपनों को लोक वाणी देते हैं। कवि ने ग्रामों को अत्यंत निकट से देखा हैं। इसलिए उसके लोकरंग में रंगे हुए ग्रामीण परिस्थितियों के चित्र सच्चाई और ईमानदारी के साथ ग्राम की आत्मा के संपर्क में मुखरित हो उठते है जैसे-

हरे भरे से गांव में ।
    सूरज सोना सा बरसाये ।।
धरती बिरछा पात हो,
    हॅसे दूधिया चॉद चॉदनियॉ,
गोरी-गोरी रात हो,
    हरियाली की गोद चूमती
नदिया बहे बहाव में।
    हरे भरे से गॉव में ।
( भोर के साथी )

माधव शुक्ल मनोज का तीसरा कवि संग्रह ‘‘माटी के बोल’’ प्रकाषित हुआ इस समय तक मनोज जी एक अच्छे युवा कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। माटी के बोल की कविताओं से कवि के प्रकृति प्रेम के अतिरिक्त जिस अन्य विशेष गुणों की ओर ध्यान केन्द्रित होता हैं, वह है दृढ आस्था और लोक गीतों से कवि का तादात्म्य।
‘‘माटी के बोल’’ की भूमिका में ब्रज भूशण सिंह ‘‘आदर्श’’ ने मनोज जी के इन गुणों की विस्तृत व्याख्या की है। कहा गया है कि मनोज जी आस्था के कवि हैं। यर्थाथ को उन्होंने विस्मृत नहीं किया है कन्तु नये जागरण के प्रति उनकी दृढ आस्था ने प्रगतिवादी कवि की निषेधात्मक धारणा का आवरण दूर रखा हैं। कवि को दुखों से ग्रसित कृशकों और मजदूरों के आत्म गौरव और विश्वास पर अटूट श्रद्धा हैं, और वह उन्हें खंडित नहीं करना चाहता है।3
    तुम मेड़ मड़ैया के राजा,
        तुम दुपहर सॉझ सकारे हो।
    तुम ही हो माटी के सोना,
        तुम पानी हो बदरारे हो ।
    तुम सोन चिरैया बिरछा के,
        कहो फूले फलै समैया
    चतुम चन्दा के भैया,
        तुम सूरज के भैया
( माटी के बोल )
    यहॉ चंदा और सूरज के साथ भ्रातत्व स्थापित कर मनोज जी ने किसान की कोमलता और कठोरता को किस खूबी के साथ संजोया है, यह मानवोचित गुण है।
    निद्र्वन्द जी ने लिखा है कि उन्होंने मानवस्वरूप की जिस देवोपम रूप की कल्पना की हैं या जिसे खेतों ओर खलिहानों में देखा है, उसे अत्यन्त कुषलता से अंकित किया हैं। मनुश्य की कुरूपता का अंकन प्रवृति के चितेरे से संभव नहीं क्योंकि उसकी दृश्टि में पतझड़ का सौन्दर्य बसन्त जी से कम नहीं भले ही कुछ विद्वान इसे पलायन की ही वृति माने । मनोज जी के लिये कविता कसक, विलास या तान मात्र नहीं क्योंकि उसकी दृष्टि में साहित्य का अर्थ हित के साथ हैं। यही कारण है कि वह  इसी सीमा के भीतर ही प्रगतिवादी और प्रयोगी दोनों हैं।
    मोरे अंगना में कंगना खनके रे ।
        मोरी नाचे राम दुलैया रे ।।
    मोरी मेड़ मड़ैया हरियानी ।
        मोरी ताल तलैया लहरानी ।।
    मोरे चंदा सूरज से खेतों में ।
        मोरी दमके नैन तरैया रे ।।
    मोरी नाचै राम दुलैया रे ।
(नीला बिरछा, 65 )

    कवि ने खेत खलिहानों से अधिक निकटता स्थापित की है और उनकी तनमयता ने चित्रों को मनमोहन रंग दिये हैं। मनोज जी के बोल सशक्त है इसका कारण है कि वे ग्रामीण पाठशाला में अध्यापक और ग्रामवासी रहे हैं। उनकी काव्य की विशेषता ग्रामीण जीवन एवं प्रकृति की विस्तृत छविया हैं ः-
    चक्की के पाटों का राग उठा घरर-घरर ।
    माटी के घर में जगा धुंधले सुबह का पहर ।
    चक्की की सुरधुन सुन रोंथ रही गैया ।
    चक्की चलाय गोरी गाये झूम रैया ।

    मनोज जी ने बुदेल खंडी लोक गीतों से अपना संबंध स्थापित कर कविता के माध्यम से गीतात्मक भाव धारा को लिरिकल बनाया है। जैसे-
    ऊॅची टगर मेरा गॉव, नदिया नीचै बहे ।

    मनोज जी के प्रकृति चित्रण में धरती के सपने और माटी की गन्ध का आधार है, कल्पना से उसमें और मनोहरता आयी हैं ‘-
    गेहॅू धन,
    खेतों झूमे, फगुनवा ।
    घूटन-घूटन हो
    खेतो में आगई
    गेहॅू की बालें
    नाचे बसन्ती बयार ।
    फूलो मन
    धरती को महके अॅगनवा
    खेतों में झूमे फगुनवा ।।

    धूप भरे फागुनी दिन को कवि अनन्त संभावना वाला मानता हैं, बसन्ती बहार को शब्दों में बॉधता है, बसंती बहार रास्ता बुहारती है और खेतों में गेहॅू के रूप में फागुन ने अपनी दस्तक दी हैं।
    मिल जुर गा रई चार जनी ।
    माटी में तुम हीरा की कनी ।।
    ले रओ हिलोरे ई तन में जिया ।
    बैलो खों हॉक रये मोरे पिया ।
    देखूॅ मै उन खों बनी ठनी ।
    माटी में तुम हीरा की कनी ।।
(नीला बिरछा, 69)

    ग्रामीण नारी की तुलना कवि हीरा से करता है। जब किसान बैलों को खेतों में हॉकता हैं तब उसका वह रूप देखकर कवि का भी मन पुलकित हो उठा हैं।
    चलों चलों खेतों में आ गओं कुवॉर ।
    साहुन निकर गओ रे,
    भादों निकर गओ
    बोले चिरैया
    कूरा ने रेवे पुआॅर ।
    चलो-चलें खेतों में आ गओ कुवॉंर ।।
( नीला बिरछा )

    यहॉ प्रकृति का स्वतंत्र आकर्षक चित्रण हैं जिसमें कुवॉंर के महीने की झॉकी भी रूपायित हुई है।
    चले अईयों हो,
    अंगना के फूल खिला जइयों
    ऊपर है बादर नीचे हैं धरती
    परती के भाग जगा जइयो ।
    चले अइयों हो,
    अंगना के फूल खिला जइयों ।
(नीला बिरछा, 48 )

    प्रकृति की छटा में मग्न कवि का मन सूरज का आहवान करता हैं। उनका मानना है। कि सूरज पूरब से आयेगा और धरती में रंग भर देगा। इस तरह मनोज जी के काव्य में सृजन विकास को देखा जा सकता हैं ।
    अपनी सोन चिरैया ।
    अपनी भोर तरैया ।।
    खेत किनारे एक मेड़ पे ।
    अपनी राम मडै़या ।।
    चहचहात हुइये भुनसारो ।
    दुलराहें पुरबैया ।।
    अपनी सोन चिरैया ।
( नीला विरछा, 120)

    मनोज जी के काव्य में ग्रामीण अंचल का नैसर्गिक सौदर्य चित्रित हुआ है। यह वह काव्य है जिसमें छोटी सी सोन चिरैया माधुर्य और सौदर्य की अक्षय राशि बन गयी हैं।
    कवि का जुडाव प्रारम्भ से ही गॉवों की और रहा है, और उनकी तन्मयता ने उसके चित्रों को मनमोहक रंग दिये है। भाषा की जनपदीय झलकियॉ ग्राम की आत्मा के संपर्क में ले आती है।
    छिप गई बादर की नन्ही तरैया ।
    झूम उठी पुरवा ले तरू की बलैया
    चहक उठी नाच उठी डाल पे चिरैया ।
    सूरज खों चूम उठी किरणों की बैयां ।
( भोर के साथी)

    कवि सोचता है कि क्षितिज में दूर तक फैली एक के ऊपर एक उठी ये किरणों की श्रृंखला, मदमस्त चलती हवा और खेतों में दिखती हरितिमा किसी भी मनुष्य को अपने महान सम्मोहन में डुबोकर कुछ समय के लिए भुला सकती हैं।
    ‘‘मनोज जी’’ ग्रामीण चित्रों के कुशल चितेरे हैं, उनका काव्य प्रकृति की मधुर चित्रशाला हैं। उसमें ग्रामीण संस्कृति का सूक्ष्म और गंभीर चित्रण मिलता हैं। उन्होंने ग्रामीण अंचल के कोमल स्वरूप के प्रति अनुराग प्रदर्शित करते हुए उसका आकर्षक और सजीव चित्र प्रस्तुत किया हैं उनके काव्य को कहीं से भी पलटिए ग्रामीण परिवेश की मोहक और उदात्त छवियॉ मुस्कराती मिलेगी जैस-
    मनचंगी गंगा नहा लई पिया ।
    जंगल में मंगल मना लय पिया ।।
    बैठी हैं माटी पे ऊॅची कगरियॉ ।
    फैली है मेड़ों पे पैनी बबुरियॉ ।।
    कॉटो पे मंदिर बना लय पिया ।
    जंगल में मंगल मना लय पिया ।।
( नीला बिरछा, 45 )

    कवि ने मेहनतकश किसान के श्रम की कीमत को समझा है उनका मन माटी के प्राकृतिक गुणों से युक्त हे। उनके अंदर वह सिनग्धता है, स्नेह हैं जिससे वह सहज रूप से सबकों अपने अंक में समेट लेते है। और ऐसा होने पर ही खेतों, खलिहानों, चैपालों झोपड़ियों और ग्रामीण अंचल की रागात्मक छवियों को स्वरूप दे सके हैं ।
यथा-
    छाती में उठे हिलोर,
    इमली पे बोले परेवा ।
    खेतों में कंचन हैं,
    फसलों का नंदन है।
    मेड़ क मडै़या पर,
    आशा का चंदन हैं ।
    गाती है अलबेली मोर,
    इमली पे बोले परेवा ।
(नीला बिरछा, 27)

    मनोज जी ने जिसका अहसास किया वही उन्होंने अपने काव्य में उतारा हैं, यहॉ झरते हुए कनेर के फूल आतुरता और अधीरता के साथ पिया से मिलन को उकसाते हैं । कवि की गॉव की गोरी विवशता से पिया की बाट जोह रही है।
जैसे-
    कब से देखुं बाट पिया की
        लौट अबहुं नहि आये रे।
    झर गई चंपा, झर गई बेला ।
        झर गये फूल कनेरा रे  ।
    राह देखती, बाट जोहती,
        देखूॅ कौन डगरिया रे ।
    फरर-फरर पुरवैया  बैरिन,
        खींचे रोज चुनरिया रे ।
    झर गई चंपा, झर गई बेला ।
        झर गये फूल कनेरा रे ।
( नीला बिरछा, 79)

    मानवीय संबंधों की प्रगाढ़ता जिस रचनाकार में होती हैं उसकी रचना उतनी ही दीर्घजीवी और प्राणवान होती हैं । कवि पुकारता है थके पॉवों को वह बताता हैं आम की गहरी छॉव गॉव की ठंडी हवा और कुएॅ का शीतल पानी-
    ठॉव-ठॉव बैठ चलो,
        पॉव-पॉव की पुकार ।
    दुखयारे बहुत खड़े खेतों के आस-पास ।
    तुमखों लो टेर रही, माटी से दौड़ सॉस ।
    नगरों के भैया ओ, अमवा का पेड़ हैं।
    ठण्डी सी पुरवेया, हरी-हरी मेड़ हैं।
    गॉव-गॉव ठहर चलो छॉव-छॉव की पुकार ।
(नीला बिरछा, 36 )

    आगे चल कर मनोज जी ने संघर्षशील वातावरण में डूब कर जिन प्रगतिशील भावनाओं को अपनाया हैं, वे प्रगतिवादी युग की सराहनीय कड़ी हैं। उनके इस काव्य में एक वर्ग एक समाज, एक समुदाय का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है। इन कविताओं में स्वाभाविकता सरलता मजदूर वर्ग की अनुगामी संघंर्षशीलता, चेतना, निम्न वर्ग के प्रति सहानुभूति, युग का यर्थाथ एवं कल्पनाओं, भावनाओं, विचारों का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है।4 यहॉ मजदूरों जमीन से जुड़े लोगों की आवाज कवि के अंतस से आती प्रतीत होती है जैसे -
    आई हिलोर फटें छाती ।
    दुख दूना रे ! दुख दूना रे !
    इन अखियन से, ।
        टप-टप टपकी ।।
    बिन बोले असुवन, ।
        की बुंदिया ।।
    इन खेतों में जब दिन डूबा ।
        भर आई साजन की सुधियॉ  ।।
    कोई न मीत हुआ अब तक ।
        थोड़े से जीवन की देहिरा  ।।
    झकझूना रे ! झकझूना रे !
( नीला बिरछा, 37 )

    कवि मानवीय स्नेह के आधार पर कविता में आम आदमी का चित्रण करता हे। जब तक रचनाकार आम आदमी की संवेदनाओं को नही समझता तब तक उसे जीवन का यथार्थ अनुभव और मानवीय चेतना की वास्तविकता का गहरा बोध नहंी होता। मनोज जी ने देहाती आदमी के आभावों, तनावों और उत्तेजनाओं का सीधा साक्षात्कार किया है और धरती उनके लिये सब कुछ है इसलिए धरती माता की वह आराधना करते है-
    मार कुदाली धरती में, ।
        मार कुदाली परती में ।।
    जय-जय धरती मैया की ।
        खेतों की, खलिहानों की ।।
    मेड़ों की, मैदानों की ।
        सूरज, अंबर बादल की ।।
    मौसम की, पुरवैया की ।
    जय-जय धरती मैया की !
(माटी के बोल )

    दरअसल जिस कवि की अनुभूति जितनी तीव्र एवं सघन होगी उतनी ही तीव्र उसकी अभिव्यक्ति की छटपटाहट और बैचेनी भी होगी। ऐसा काव्य वैचारिक धरातल पर बहुत सर्तक, जागरूक और समय के अनुकूल होगा, उसमें गहराई सच्चाई और विस्तार होगा।
    जो अनुभूत नहीं वह साहित्य भी नहीं है। रचना रचनाकार की भट्टी में पिघलकर निकलती है। इसलिए उसमें अनुभूति की चमक होती है, ओर वह नई भी होती है। जो कुछ अनुभूति का विषय नहीं  बन सका, वह साहित्य की सीमा के अन्तर्गत नहीं  आता क्योंकि अनुभूति में ही वह शक्ति निहित है कि मनुष्य के मर्म का स्पर्श करें और उसकी संवेदन का विस्तार करे जो साहित्य का स्वीकृत धर्म है।5
    ‘‘मनोज’’ जी को अपनी कविता और आंसुओं से गहरा लगाव है। वह पूरी गंभीरता और तन्मयता से इन गीतों को गाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कही न कही किसी न किसी को ये गीत प्रभावित करेंगे, उनके आंसू निष्प्रभाव नहीं है-
    टूटी डगाल रे ।
        रमुआ के बाग की ।।
    मुरझाई ऐसी जैसे बिछड़ा हो संग ।
    पत्तों में रोता है, बिरछा का रंग ।।
    पीर जाने कितनी है, रमुआ के भाग की ।
    टूटी डगाल रे, रमुआ के बाग की ।।

    इसके अलावा मनोज जी ने कुछ बुदेली छक्के भी लिखे जो उनकी ईमानदारी और साहसिकता के प्रमाण हैं। अनुभवों पर आधारित साधारण सी कविताएं  भी मन को छू जाती है। इन कविताओं के माध्यम से उन्होंने कृत्रिमता और व्यवस्था के खोखले पन को उजागर किया है जैसे ः-
    बा सरकार तुमाई आय ।
        जा सरकार हमाई आय ।।
    छीना-झपटी ।
        चोर बजारी ।।
    सरसा जैसी ।
        है मों बाय ।।
    दल के दल ।
        दल दल में फॅस गये ।।
    लपकी गाय ।
    गुलेंदों खाय ।।
    जा सरकार हमाई आय ।
(नीला  बिरछा, 127 )

    मनोज जी ने लोक जीवन के साथ-साथ इसी लोक में जो दूसरा वर्ग है, जो अत्याचार करने में कुशल हैं, शोषण करने में शीर्ष पर हैं। अपने वैभव के मद में अन्धा हो कर मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता इस वर्ग को भी कवि ने सत्य रूप में प्रस्तुत किया है-
    अपनी धुन में भूले।
        देखो फुकना से फूले ।।
    महल अटारी ।
        डार कें डोरी ।
    झूल रहे है झूले ।।
        बना रही है आज गरीबी ।
    सड़कों पे घर घूले ।।
        देखों फुकना से फूले ।
(नीला विरछा)
    हम विचार करे तो पॉयगे कि मनोज जी मात्र भावनाओं के कवि नहीं है, वे तो लोक से जुड़े हुए कवि है। उनकी लोक दृष्टि के घेरे में समूचा लोक जीवन अपनी पूरी वास्तविकता और गुण-दोषों के आया है। यही कारण हैं कि कवि एक ऐसे रूप में हमारे सामने आता है, जो भावनाओं के संसार में नहीं बहता बल्कि सच का सामना करता है, और दूसरे व्यक्तियों को भी देखता हैं। इस प्रकार के देखने में मनोज जी ने निश्चित ही उस व्यक्ति को अधिक सूक्ष्मता से देखा हैं जो खूब मेहनत करता है और बदले में कुछ खास नहीं पाता जैसे ः-
    तो खों, मो खों, ओ खों ।
        केत-केत मो सूखें  ।।
    भुनसारें से राशन लेवे ।
        दिन डूबे लो खूंतों ।।
    चिल्ला चिल्ला सो गओं हुइये ।
        घर में मोड़ा भूखों ।।
    केत केत मो सूखों ।

इसी प्रकार ः-

    अपनो मतलब सॉटो ।
        सब की पत्ती काटों ।।
    मिल जुर के छाती में छेदों ।
        फूल बता कें काटों ।।
    सब की पत्ती काटों ।
( नीला बिरछा )

    मनोज जी का एक और महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है ‘‘धुन की रूई पे पौआ’’ इसमें उनकी नयी शैली में बुदेली कवितायें संग्रहीत है। इन कविताओं में शैलीगत नवीनता सरल शब्द योजना, गहरी अभिव्यक्ति और मंत्र मुग्ध करने वाली चित्रोपयता मनोज जी को नयी पहचान देती है।6 प्रायः बुन्देली कवि या तो ईसुरी की फाग शैली  अपनाते है या पद्माकर की श्रृंगारपरक शैली किन्तु मनोज जी ने इनसे हटकर नवगीत शैली को बुन्देली में स्थापित किया है-
    सूखे ककरी को जऊआ ।
        छाती में उगे अकौआ ।।
    सिर के ऊपर आज विपत को ।
        बोलो कारौ कौआ ।।
    ऐसो लगे समय ने धर दओं ।
        धुनकी रूई पे पौआ ।।

    आज हमारा समाज जिस भ्रष्टता की ओर बढ़ रहा है। शोषण और स्वार्थ को ही प्रजातंत्र का मूल्य मान लिया गया हैं। मनोज जी ने राजनीति, उसमें घुटता आदमी, जीवन की सच्चाई, इन्सान की लाचारी उसकी नियति और आजादी की विडम्बना पर सीधा प्रहार किया है-
    ओर-छोर ने कहूँ अंत हैं ।
        अपनो प्यारों लोकतंत्र है ।।
    तें भी राजा, मै भी राजा।
        एक चका सो गोल यंत्र हैं ।।
    झाड़ा- फॅूकी अंट संट सब ।
        जादूगर देखों स्वतंत्र है ।।
    अपनो प्यारों लोकतंत्र है ।
( धुन की रूई पे पौआ,, 26)

    मनोज जी के काव्य में चित्रित परिवेष राजनीति और इससे संबंधित अनेक समस्याओं को भी मूलित करता है। हमारे यहॉ जो कुर्सी की राजनीति की परम्परा है कवि उस पर चोट करता है ः-
    जीत जात के बैठे ऊपर ।
        बांध लये कुर्सी से गोड़ें ।।
    अपनोई नगर गॉव सब भूले ।
        नाम बड़े है दर्शन थोड़े ।।
( धुनकी रूई पे पौआ, 14)

    मनोज जी की कविताएं  स्वस्थ सामाजिक जीवन से जुड़ी है। जब कभी उन्हें सामाजिक जीवन में विकृतियॉ नजर आती है, तो वे न केवल दुःखी होते हैं, अपितु एक स्वस्थ समाज की कल्पना से भरते हुए विकृतियों के पोषकों पर व्यंगात्मक प्रहार करते ह-
    मटका कें नैना, लचका कें कम्मर ।
        कैसो  दिखा रये कमाल पिया ।।
    देश कौ हो रओ है, इकदम कबाड़ो ।
        छोबी पछाड़ को बन रओ अखाड़ो ।।
    सब कोई अब अपने मन के है राजा ।
        आदर्शो की गिर रई दिवाल पिया ।।
( धुन की रूई पे पौआ, 44)

    कवि की कुछ कविताएं  ऐसी हैं जिनमें कवि ने समाज के दुख दैन्य और विषमताओं के चित्र खीचें है जो यथार्थ की भूमिकाओं पर अवतरित है। मनोज जी का जीवन दर्शन बहुत प्रभावित करने वाला है। आत्मा जगत, शरीर, प्राण, नियंता की असलियत से भी वे बेखबर नहीं है। देखें-
    बुरे काम से ऐं कौ तो ।
        ऐब और गुन लेखौ तो ।।
    झार-झूर के अपने मन कौ ।
        कचरा बाहर फैकों तो ।।
    ऐना टॉगों तुम्हारे घर में ।
        अपनी सूरत देखों तों ।।
(धुन की रूई पे पौआ, 35)

    मनोज जी का काव्य आम आदमी से जुड़ा हुआ है। उन्होंने जो मध्यमवर्गीय परिस्थितियों का चित्रण किया है वह अद्भुत है। उनकी कविता आम व्यक्ति की कविता है ः-
        रात की कुठरिया में।
            सो रओ हैं भुनसारौ ।।
        चिकटे से उन्ना ।
            चरर-मरर खटिया ।।
        मच्छर भगावे खौं।
            गुरसी में धधकत है ।।
        कंडी कौ धुआं  ।
            माटी के तेल की ।।
        भभकत है डिबिया ।
            करिया सी लौ में ।।
        लिपटौ है उजियारौ ।
            रात की कुठरिया मैं ।।
        सो रओ है - भुनसारौ ।।
( धुन की रूई पे पौआ, 16 )

    आधुनिक कविता की विशेष प्रवृत्ति के रूप में राष्ट्रीय काव्य धारा का विशेष महत्व है। इसी तरह मनोज जी की कविताओं में भी देशभक्ति और राष्ट्रीय भावों का गहरा प्रसार दिखाई देता हैं ः-
        मिल जुर के अपनी मेहनत से ।
            गॉधी को देश सजैयों, मोरे लाल ।।
        गॉधी जी ने सौंप दओ है ।
            बिरछा जैसो रोप दओ हैं ।।
        फरे और फूले जो निसदिन ।
            खून सींच हरियईयो मेरे लाल ।।
        गॉधी को देश सजैयो । मोरे लाल ।
( नीला बिरछा )

    उन्होंने ‘‘नेहरू की वसीयत’’ कविता में नेहरू जी के भावों को बुदेली में व्यक्त किया है ः-
        हाथ जोड के शीश नवाऊं  ।
            देश विदेश जहान खों ।।
        वसियत लिख के धर दई हमनें ।
            जनता और किसान खों ।।
( नीला बिरछा, 96)

    इस तरह से माधव शुक्ल मनोज के कविता संसार में हमें अनेक विविधताएं देखने को मिलती है, लगता है कविता का प्रत्येक पद लोक संगीत का उल्लासित अंग है। इतनी सहजता, ग्राम जीवन से इतनी निकटता बुन्देली कविता में कम ही देखने को मिलती है। मनोज जी का काव्य व्यक्तित्व बहुआयामी है। लोक भाषा में जी रहे मनुष्य की त्रासदी को जिन कोणों से वे उजागर करते हैं। इस संबंध में डॉ. कान्ति कुमार जैन के शब्दों को उद्धृत करना चाहॅूगा ‘‘मनोज ने बुन्देली कविता को एक नई विधा अभिव्यक्ति देकर बुन्देली कविता का प्रतिनिधित्व किया है। नई पीढ़ी उनकी इस मौलिक शैली, अभिव्यक्ति और नये प्रयोग- प्रतीकों से अवश्य प्रभावित होगी।’’
संदर्भ-
1.    भोर के साथी की भूमिका - डॉ रामरतन भटनागर।
2.    म.प्र. के प्रतिनिधि साहित्यकार - टी दिनकर 10.12.61 नई दुनिया ।
3.    माटी के बोल की भूमिका- ब्रज भूशण सिंह ‘‘आदर्श’’
4.    माटी के बोल की भूमिका- ब्रज भूशण सिंह ‘‘आदर्श’’
5.    नये साहित्य का तर्क शास्त्र विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पृ.14
6.    नवभारत - भोपाल - बटुक चतुर्वेदी ।
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