Wednesday, 13 November 2013

माधव शुक्ल ‘‘मनोज’’ के काव्य में बुंदेली चेतना और संदर्भ-दो-लघु शोध प्रबंध


माधव शुक्ल ‘‘मनोज’’ के काव्य में बुंदेली चेतना और संदर्भो का अध्ययन 
 आधुनिक बुन्देली कविता के सन्दर्भ मैं माधव शुक्ल 'मनोज' के काव्य का अनुशीलन 
 लघु शोध प्रबंध-एक-अतुल कुमार श्रीवास्तव-सागर
 अध्याय - 5
बुन्देली चेतना से अभिप्राय:  बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में व्याप्त चेतनाशन्य है और जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।1
से है। अब यहॉ ‘‘लोक’’ अपने आप में बड़ा व्यापक शब्द है। शब्द कोशों में इसके कितने ही अर्थ मिलेगें, जिनमें से सामान्यतः दो अर्थ विशेष प्रचलित है - एक तो विश्व अथवा समाज और दूसरा जन सामान्य अथवा जन साधारण । आज वर्तमान साहित्य के भेंद के विषेश संदर्भ में ‘‘लोक’ मनुश्य समाज का वह वर्ग है, जो अभिजात्य संस्कार, शस्त्रीयता और अहंकार से
मनोज जी की कविता में जो बुन्देलखण्ड के गॉवों  के लोक जीवन का चित्रण हेाता है उससे लगता है कि उनके काव्य में बुन्देली चेतना कूट-कूट के भरी है। ये तो निष्चित है कि, हर क्षेत्र की लोक भाशा, उसकी टोन, उसकी कहन अलग प्रकार की होती है। हर अंचल की जमीन और जलवायु में भी अन्तर होता है और इन्ही सब कारणों के चलते वह क्षेत्र ‘‘विषेश’’ हो जाता है। इसी तरह बुदेल खण्ड अंॅचल की कृशि प्रधान लोक संस्कृति में पले पुसे लोगों में संतोश की भावना अधिक है। यहॉ के पर्वत, यहॉ की नदियों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। हवाओं से क्रीड़ा करती, लहलहाती यहॉ की फसलों में  स्वछंद  श्रृंगार की प्रवृत्ति है। तो यहॉ के जंगल और कठोर चट्टानों से घिरी हरियर धरती से कर्म और करूणा की सुगंध आत है।
दर असल लोक भाशा और लेाक वातावरण के विभिन्न रूपों में लिपटा अंतरंग एक है। अगर हम कुछ बुन्देली लोकगीतों की चर्चा करे ंतो देखेगे कि लोककवि ईसुरी ने अपनी फागों में अपने भोगे हुए सुख-दुख, गॉव में पड़े अकाल के षिकार गरीब किसानों की भूख का वर्णन किया है। असल में लोक कवि का मन लोक के साथ चलता है, उसमें लेाक का अतीत, वर्तमान और भविश्य सब रहता है। उनकी कविताओं में पारिवारिक संबंध, सामाजिक उत्सव, समस्यायें, जीवन के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चित्र लिखे होते है। इसी तरह बुन्देली के कवि मनोज की रचनाओं में हमें लोक जीवन के सुख दुख, उल्लास, हर्श विषाद और संघर्शो की अभिव्यक्ति मिलती हैं बाल कृश्ण भट्ट ने लिखा है ः-
‘‘ अब ग्राम्य कविता पर ध्यान दीजिये । मल्लाहों के गीत, कहारों का कहरवा, विरहा अथवा आल्हा आदि सब केवल गवॉंरों की रोचक कविताएॅ । उनकी प्रषंसा में हम यदि कुछ कहें तो नागरिक जन जो भाशा की उत्तम कविता के रसपान के घमंड में फले नहंी समाते अवष्य हम पर आक्षेप करेंगे और हमें निपट गवॉंर समझेंगे।2
इन सब की परवाह किये बिना कवि मनोज ने अपनी कविता में ग्राम जीवन को अपनाया है। वे आम जन के बहुत निकट रहे, इसी कारण उनकी आम जीवन में पर्याप्त रूचि रही है। ऐसी रूचि का कोई एक कारण नहीं है, अनेक कारण है। पहला कारण है कि वे लोक जीवन में पले और बड़े हुए, दूसरी उनकी धारणा है कि मानव विकास के लिए लेाक संस्कृति का ज्ञान अत्यंत आवष्यक है। यही कारण है कि कवि मनोज का काव्य सृजन ग्राम्यानुभूति मंे डूबा हुआ है। ग्रामों की पीडा उनके सुख दुख और उनके साहस को उन्होंने बहुत निकट से देखा है। गॉव को भोर से लेक आधी रात को बेला फूलने तक उनकी कवि दृश्टि गॉव की पूरी दिन चर्या को निहारती है। ग्राम जीवन की तमाम आहटें उनकी कविताओं में स्थान पा गयी है।   यहॉ ऋतुओं, हवाओं, पषु पक्षियों मेलों ओर तीज, त्यौहारों सब की भागीदारी सुनिष्चित की गयी हैं।
    हम मनेाज जी की कविताओं में निहित बुन्देली चेतना को इस प्रकार समझ सकते हैं।


ग्राम्य जीवन का चित्रण ः
    मनोज जी को सुनते या पढ़ते हुए हमें ग्रामीण परिवेष का चित्रण उभरता प्रतीत होता है जैसे ः-
    हरे भरे से गॉव में ।
    सूरज सोनेा सो बरसायें, धरती बिरछा पात हो ।
    हॅंसे दूधिया चॉद चदनियॉ, गौरी-गौरी रात हों ।।
    मनोज जी के ग्राम्य काव्य में बुन्देली ग्रामीण परिवेष का नैसर्गिक सौदर्य चित्रित हुअ है। इनके काव्य में सूरज-चॉद माधुर्य और सौदर्य की अक्षय राषि बन गये हैं।
और देखें ः-
    नीचे है खेतो में फसलों का झंडा ।
    टूटी झुपड़िया की छॉव, नदिया नीचे बहे ।।
    ऊॅची टगर मेरा गॉव, नदिया नीचे बहे ।
    नदियें और उनके वक्ष पर तैरती लहरें यहॉ कविता के दोनों किनारो के मध्य निरन्तर यात्रित हो रही है। बुन्देल खण्ड की प्रकृति का पल-पल वरिवर्तित वेष यहॉ न जाने कितने रहस्य, माधुर्य और पारदर्षी सौदर्य का निर्झर बन कर प्रवाहित हुआ है। 
कवि मनोज ने बुदेली ग्रामों के समस्त गत्वर सौदर्य को ग्रहण करके अपनी संवेदनषीलता का परिचय दिया है ः-
गली-गली गॉवन में, नदियॉ पहारन में ।
पतली सी पुरवैया घूम रही हो ।।
अमवा की डारों को चूम रही हो ।
पतली सी पुरवैया धूम रही हो ।।
अब यहॉ गॉवेां का रूप सौदर्य कवि के आल्हादमय संवेगों को  ही नहंी जगाता, वरन् उसकी ग्राहक इन्द्रियों को उत्तेजित करके पूरी तरह सक्रिय भी बना देता है। इन्ही से प्रभावित हो कर कवि ने गॉवों का मनोहारी चित्रण किया है जैसेः-
सूनी बगिया, ओ मेरे भैया ।
चैन चिरैया लिआईयों ! ।।
कब से कितनो हिया पिरानो ।
कितने बदलों है सिरहानों ।।
कवि मनोज ने अपने काव्य में ग्रामीण सौन्दर्य के अलावा बुदेली ग्रामीणों की समस्याओं पर भी विचार किया है। जैसे-जैसे कवि की भावनाएं  परिश्कृत होती गयी वैसे-वैसे उनकी कविता वैचारिक होती गयी यथा ः-
गॉवों में निवासरत ग्रामीण किन आलावों से झूझते हैं, उनका जीवन संघर्श से भरा होता है। कवि ने उनकी इस दषा पर भी करूणा की दृश्टी डाली है ः-
टूटी डगाल रे, रमुआ के बाग की ।
चटकी है ऐसी जैसे टूटी हो बॉंह ।।
गाढ़े से दिन में हो फीकी सी छॉह ।
टूटी है एक कड़ी, रमुआ की फाग की ।।
टूटी डगाल रे, रमुआ के बाग की ।।
कवि गॉव के दुख में “ाामिल है और भावनाओं में वह लिखता है ः-
आई हिलोर फटे छाती
    दुख दूना रे ।
दुख दूना रे ।
इन अॅखियन से टप टप टपकी
बिन बोले असुवन की बुदियॉं।
रचना प्रक्रिया के संबंध में अक्षेप ने कहा है कि ‘‘परिवेष की चेतना आज की प्रबल आवष्यकता है। रचनाकार के परिवेष से तात्पर्य है। जिसके बीच वह जीता है जिससे वह प्रभावित होता है।3
व्यापक लेाक दृष्टि ः-
    मनेाज जी मात्र भावनाओं के ही कवि नहीं हैं, वो तो लोक से जुड़े कवि है। यहॉ लोक दृश्टि से अभिप्रायः केवल लोक जीवन से नहीं है, गॉवों के अलावा उस संपूर्ण समाज से भी हैं, जो नगरों में भी रहता है। इस प्रकार से देखने में मनोज जी ने निष्चित ही उस व्यक्ति को अधिक सूक्ष्मता से देखा है जो सुबह से “ााम तक मेहनत करता है जैसे ः-
    टेढ़ी सी गलियों में जीवन भर चलने है ।
    अॅधियारी दुनिया में दीपक-सो जलने है ।।
    दर्दीले मौसम में होत दुख दूना है ।
    फिर भी इन हाथों से अंगारे छूना है ।।
    कवि ने एक आम आदमी को बहुत करीब से देखते हुए, मन की दषा का वर्णन बखूबी किया हैं यथा ः-
    जिन्दगानी भर ।
    चकिया से चले ।।
    गेहॅू से पिसे ।
    चैतरफा घुमें ।।
    घरघरानें दरदरानें ।
    सजा सी काटत ।
    जेल खाने में पिड़े ।।
    मनोज जी एक ऐसे कवि है जो अपने-आपकों धरती और किसान का कवि मानते हैं। ईसुरी से प्रारंभ होकर आज की पीढ़ी तक चली आती विषाल जन क्षेत्र की जातीय  चेतना की अमूल्य उपलब्धि के रूप में माधव “ाुक्ल ‘‘मनोज’’ के काव्य को समझा और जाना जा सकता है। इन्होंने अपने काव्य के माध्यम से आम जन के अनुभवों को अपनी कविता का पदार्थ बनाया है, तथा उसे और अधिक, जीवन्त, सार्थक, मूल्यवान और प्रेरक रूप प्रदान करते हुए पुनः जनता को लौटा दिया है। इनकी कविता में बुन्देली चेतना का प्रखरतम् विकास देखने को मिलता है। जब वे गर्मी की धूप में कुदाल  को धरती पर चलाते हुए इन्सान को देखते है तो वह द्रवित हो उठते हैं। उल्लेखनीय तथ्य है कि मनोजकी अधिकांष कविताओं में किसान को प्रायः काम करते हुए चित्रित किया गया है कवि ने किसान को काम करते हुए निकट  से देखा है, उसके श्रम को पहचाना है दूर से खड़े होकर उसकी स्थिति की कल्पना नहीं की है। कहने का अभिप्राय यह हैं कि निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मनोज जी के काव्य में ग्रामीणों श्रमिकों के प्रति जो भाव व्यक्त हुुए है, वे उनके मानववादी दृश्टिकोण का परिणाम है।
लुप्त होते ठेठ बुन्देली ‘ाब्दों का प्रयोग ः-
    आज के आधुनिक युग में जहॉ हम बुन्देली के पुराने और मीठे “ाब्दों को भूलते जा रहे हैं। वही कवि मनोज जी ने अपनी कविताओं में ठेठ बुन्देली “ाब्दों का प्रयोग किया है। जहॉ क्षेत्र के कई आधुनिक कवियों ने खड़ी बोली की ओर रूख किया, किन्तु मनोज जी ने बुन्देली को अपनाया हैं और उसे “ाक्ति सम्पन्न भाशा के रूप  में देखा है। उन्होंने न केवल प्रत्येक “ाब्द की आत्मा में उतरने का प्रयास किया, अपितु पर्यायवाची “ाब्दों के बीच के अन्तर को ध्यान में रखते हुए सही भाव के लिये सही “ाब्द के प्रयोग पर अधिक जोर दिया है यथा ः-
        फागुन आ गओं ।
        नवरंग छा गओ ।
        हो गई जा धूरा गुलाल पिया ।।
    बुन्देली के कई “ाब्द और कई प्रतीक उन्होंने अपनी कविता में मोती की तरह पिरोय है जैसे ः-
        जॉता चक्की, ओखल मूसल ।
        सीके टंगे मियार है ।।
        चिथडों से वह लदी अरगनी ।
        बेड़ा भीतर द्वार हैं ।।
    मनोज जी की कविताओं में उनका झुकाव बुन्देली जन साधारण की बोलचाल की “ाब्दावली की ओर देखने में आता हैं । जिसका कारण हैं कि उनके काव्य में जनपदीय और आॅचलिक “ाब्दों की अधिकता है यथा ः-
        हड़िया कुठिया और कठौता ।
        रस्सी आॅगन चाक है ।।
        कंडा लकड़ी भरा मचेरा ।
        पौरों में अधिंयॉर हैं ।।
और उदाहरण देखें ः-
ऽ    अपनी धुन में भूले ।
देखो फुकना से फूले ।।
ऽ    नैनन खों आॅजें ।
हंसबे के काजें ।।
कुजाने का उमड़ों घटा सो ।
फिर को जो भॉ रओ मठा सो ।।
प्रतीकों का प्रयोग देखें ः-
ऽ    लगे नोंन सी जा जिंदगानी ।
बाते फीकी गाजर सी ।।
    उॅसई सी जा लगन लगी हैं ।
            दुनियॉ  जूठी पातर सी ।।
ऽ    लटके रें गये रोंठा सपने ।
ऽ    बड़ी रसीली कॉ गई रातें ।
कॉ गये वे दिन गन्ना से,
    कहने का अभिप्राय है कि मनोज जी के काव्य में बुन्देली के ठेठ “ाब्द और प्रतीक प्रयोग सहज तरीके से किये गये हैं जो उनकी बुन्देली चेतना को स्पश्ट करते हैं।
लोक संगीत और कवि ‘‘मनोज’’ ः
    मनोज जी ग्रामीण परिवेष में पले बड़े और वे लोकगीतों की समझ और उनके प्रति पर्याप्त रूचि रखते हैं । वे एक अच्छे गायक भी है। प्रायः संगीत के क्षणों में लोक गीत के स्वर ही जुबान पर अधिक आते हैं। इसी भाव से प्रेरित होकर और अपनी इन्ही मान्यताओं के आलोक में मनेाज जी का लोक संगीत महत्व रखता है।अपनी इसी लोक संगीत की समझ के चलते वह राईपर मोनोग्राफ लिख पाये है। उनके काव्य में जहॉ भी लोकसंगीत का असर है, वहॉ लोक चित्त को गहराई के साथ अभिव्यक्ति मिलती है जैसे ः-
ऽ    सॉझ सकारे हॉ-हू की  गॅूजे खेतों में रोग हो,
रैया गावे, दिलरी गावें, गाये मौसम फाग हों।
ऽ    खड़क रही खंजड़ियां हाथों की गदियों पे।
अलगोझा गूॅज रहे मछुओं के नदियों पे ।
ऽ    चरवाहें की बजी बसुरियॉ जंगल गूॅजा रे ।
कवि मनोज ने अपने काव्य में बुदेली लोक संगीत को बड़े आदर्ष से जगह दी है, और उसमें बड़ी विषेशता यह है कि बहुत सहजता और स्वाभाविक तरीके से बानगी देखें ः-
बजी नगड़िया, नाचे गोरी कर मन का सिंगार रे ।
बिंदिया दमकी, नथनी दमकी, ऐरन चमके कान के ।।
फड़के अधर सॉस लहराई, गीत उठे स्वर तान के ।
    यहॉ गोरी के श्रृंगार का बड़ा मनोहारी चित्रण किया है ।
एक उदाहरण और देखें ः-
    मन में उमंग भरे चैता के ढोल बजे ।
    ढपला रमतूला संग बॉसुरिया कूक उठी ।।
    टिमक उठी टिमकी रे, मैया के मंदिर में ।
    मन में उमंग भरे चैता के ढोल बजे ।।
लोक संगीत से भरा उनका मन बसनत के आगमन पर गा उठता है ः-
    बजी ढुलकिया तिक-तिक धिन्ना ।
    नीके बसन्ती आ गये दिना ।।
    इस तरह के चित्रण में कवि ने अपनी भावनाओं को बड़े ही उन्मुक्त रूप से व्यक्त किया है। कवि की अभिव्यक्ति में एक मस्ती हैं उसमें जीवन का संगीत  है।
    हम देखें तो कवि ने बुन्देली ग्रामीण जीवन के बिम्बों को बड़ी सतर्कता से प्रस्तुत किया हैं। उन्हें लगता है, कि चिरैया दूध से भरी जुनई के दाने को बड़ी रूचि से खाती है। उन्हें लगता है कि नगड़िया की थाप पर गोरी मन का श्रृंगार कर नाच उठती है । ऐसे चित्रांकन में कवि ने पूरे के पूरे बुन्देली दृष्य को अपनी सौदर्य चेतना के रंग में रंगकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है।
    मनोेज जी ने बुन्देलखण्ड से जुड़ी सौन्दर्यानुभूति को अपने काव्य में बड़ी सूक्ष्मता से उभारा है।  बुन्देली जनपद के गॉव तथा उसके जीवन का समग्र और स्वाभाविक चित्रण उनकी कविताओं में देखने मिलता है। वास्तविकता यह है कि उनके काव्य में ग्रामीण जीवन का केवल बाहरी रूप ही चित्रित नहीं हुआ है बल्कि उसके आन्तरिक तत्व, स्वभाव तथा संस्कृति को भी अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है।
संदर्भ ः
1.    हिन्दी साहित्य कोश (भाग-1) पृश्ठ 747 ।
2.    बालकृश्ण भट्ट - हिन्दी प्रदीप अक्टूबर 1986 पृश्ठ 15 ।
3.    अज्ञेय@ साहित्य का परिवेष पृश्ठ @ 33 ।
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