Wednesday, 19 June 2013

'अ' अनार कौ मोरी बिटिया- माधव शुक्ल ‘मनोज'

माधव शुक्ल मनोज 
'अ' अनार कॊ  मोरी बिटिया 
'अ' अनार कौ मोरी बिटिया

अ अनार कौ मोरी बिटिया
पढ़ हे किताब में
लिख हे स्लेट पे
अ, अनार को मोरी बिटिया।

पहिली पास करहे
फिर दूसरी में जे हे।
अक्षर अुर गिनती खों
गा-गा कें कह हे।
रामायण पढ़ हे ऊ बांच लेहे चिठिया
अ, अनार कौ मोरी बिटिया।

माधव शुक्ल 'मनोज' जी की  हस्तलिखित डायरी  मै कविता 
झांसी की रानी
सीता सी कहानी।
गंगा सी पावन
मोरी बिटिया रानी।
बाबा के हाथों की बन ऊ लठिया।
अ, अनार कौ मोरी बिटिया।

ममता की क्यारी
घर-घर की फुलवारी।
माथे कौ चंदन
ऊ अरचन की थारी।
उड़ जेहे ऐसी जैसे-
आंगन की चिड़िया।
अ, अनार कौ मोरी बिटिया।

इस कविता को मध्यप्रदेश शासन ने अपनी 'बेटी बचाओ अभियान' योजना के प्रचार-प्रसार के लिए स्वरांकित कर जनता को शिक्षा और बेटी के प्रति उत्साहित किया है। यह कवि माधव शुक्ल ‘मनोज’ का सम्मान है जो देश का गॊरव हैं।जनसंपर्क, भोपाल के माध्यम से निर्मित और प्रचारित किया जा रहा है। गीत को स्वर दिया है श्री शिवरतन यादव जी ने जो पिता की अनेकों कविताओं को स्वर और संगीत से संजोया है।

पिता जी ने यह कविता सागर के उनके अपने परकोटा के मकान की छत पर बैठ लिखी थी। पिता अपने आत्म को कवि और शिक्षक रसधारा इतने गहरे पैठाने लगे कि बस क्षण में ही संसार की बाह्य परिधि से केन्द्र में इतनी तीव्रता से चले जाते कि चाय की प्याली खत्म होते-होते एक बड़ी कविता उनमें आकार ले लेती। ऐसे ही समय में स्कूल में पढ़ रही अनेकों छोटी-छोटी बेटियों की याद इस कविता में एक शब्दाकार लेने लगी। अक्सर वे इस कविता को अक्सर बच्चों, स्कूलों के अपने उत्सवों और कभी शिक्षा मनीषियों के बीच सुनाते, इस कविता को उन्होंने कवि गोष्ठी, सम्मेलनों और छतरपुर और भोपाल आकाशवाणी में भी गाया। इस कविता का प्रकाशन पत्रिकाओं में हुआ।

कवि और शिक्षक मन जब लोक के अन्तरमन से जु़ड़ जाता है और जनमन की धडकन से घड़कने लगता है तो ऐसी कविता जैसे बरस-बरस पढ़ती है। पिता जैसे अपनी जटाओं में इस उतरती धारा को समेटने में सिद्धस्थ थे और उसे अपने रस में सराबोर कर नदी बनाना भी जानते थे।

एक बार पिता ने कहा था कि मैं एक कवि सम्मेलन से लौटते कटनी से सागर की ओर आ रहा था कि ट्रेन मैं बैठे मुझे लगा कि जैसे नदी, पहाड़, चरती हुई गायें, उड़ते पंछी, रास्ते में दीखते आते जाते लोग और साथ में यात्रा करते लोगों में  ‘‘मैं ही हूं’’ ऐसी अनुभूति कुछ समय प्रवाहित होती रही और जब इस प्रवाह से जब मैं बाहर आया तो लगा ब्रम्ह की सत्ता की एक झलक से गुजर गया हूं। लगता हूं अब लगातार नया हूं और आदमी से ज्यादा कुछ और ही हूं...

 पिता को जैसा देखा, जाना, समझा वैसा ही लिख दिया है
                                                          आगत शुक्ल 

Wednesday, 5 June 2013

बेला-तमाल-बुन्देली गीत नाटिका

माधव शुक्ल मनोज 
बेला-तमाल...माधव शुक्ल मनोज
बुन्देलखंड के सागर गढ़पहरा की एतिहासिक एक नर्तकी और राजा की प्रेम कहानी

इतिहास की मद्धिम रोशनी में टिमटिमाती इस लोक तथ्यों में बिखरी कथा को माधव शुक्ल मनोज ने समझने, माध्यम बनने और प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

मनोज जी ने सदैव गांवों के संसार और उसके आसपास बिखरी असहनीय पीढ़ा के बीच आदमी को जीवन जीते देखा है तो उसके उन मर्म को भी जानने की कोशिश की है जिनमें जीवन कभी कभी सुख की अगढाईयां भी लेता है। सुख की क्षणिक कौध और उसकी आशा जीवन को फिर-फिर जीने की ताकत भर देती है।

मनोज जी ने बुन्देलखंड की राई और उनकी नर्तकियों के कलाकार और उनके मन, सौन्दर्य को परखा है और उन्हें समाज में सम्मानीय स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश की है। इस कार्य की सतत् चिन्ता का एक प्रयत्न इस लोक कथा को कहने में स्पष्ट दीखता है।

मुझे याद है जब बेला-तमाल पर काम शुरू हुआ तो मैंने अपने घर की खटखट (बालकनी) से देखा तो पिता को लेने श्री विष्णु पाठक जी जो लोक कला अकादेमी, सागर के डाईरेक्टर हैं...एक जीप लेकर आये, साथ में कैमरा, खाने का साजो सामान और जाने क्या-क्या। वे इस रहस्य रोमांज को जैसे जी लेना चाहते जैसे यही उनके जीवन का सार्थक शिखर हो और वे सब उत्साह में गढ़पहरा को चल दिये।

शाम को वापस आये तो पिता के चहरे पर एक अजीब सा भाव था कुछ विस्मयभरा, कुछ जिम्मदारी सा, जैसे उनका कवि मन बहुत पीछे के दृश्यों को खोजता सा...वे आये और बताने लगे कि शीशमहल में जैसे उन्हें धंधरू की आवाज सुनाई दी थी...राजमहल के आंगन में जिसमें कंघे तक जंगली घांस उगी थी उस बीच में उन्हें एक क्षण के लिए एक राजा और उसके बाजू एक नर्तकी दिखी जो देखते देखते हवा में धुल गई, उनके अंर्तमन को लगातार किसी के आसपास होने की खबर लगती रही और जब उन्होंने नटनी की समाधि को देखा तो वे बहुत भावुक हो गये... और बीते समय के समय सूत्र जैसे उनके अवचेतन से जुड़ने लगे...

अब पिता रात-रात भर इस लोक  कथा को लिखते. हमारे परकोटा वाले घर से यदि दूर देखें तो गढ़पहरा वाली पहली चढ़ाई और उसके बाद गढ़पहरा की पहाड़ी...तो पिता उस ओर दूर देखते रहते...लिखते रहते...सुबह देर से उठते तो कहते... यह जो में लिख रहा हूं ऐसा लगता है कि कोई दूसरा ही इसे लिख रहा है, मुझसे लिखवा रहा है।

चार दिन बीते तो एक आश्चर्य की घटना घटी ...विष्णु पाठक जी ने जो उस दौरान जो फोटो खीचे थे वे बन गये और पाठक जी उसे लेकर घर आये और कहा कि मनोज देखो तो इस फोटो में वे राजा और वह नर्तकी तो साथ दिख रहे हैं। तब वह फोटो कई लोगों को दिखाया... लोग हतप्रभ थे, पिता अस्वस्त हो गये कि नर्तकी की प्रेमकथा सत्य है और पांच दिन बाद वे सभी फोटो एक दूसरे से ऐसे चिपके कि दुबारा कोई नहीं देख सका...

कथा लिख ली गई, पाठक जी और उनकी अकादेमी के अनेक नये-पुराने कलाकारों ने इसे स्वर और संगीत से संजोया, बहुत-बहुत मेहनत की और इसे छतरपुर आकाशवाणी से पहिली बार रिकार्डिंग करके प्रसारित किया गया। अब तक इसे सैकड़ों बार प्रसारित किया जा चुका है। खासकर प्रतिवर्ष लगने वाले सागर के ‘गढ़पहरा का मेला’ जो आषाढ़ के चार मंगलवारों को भरता है अवश्य ही सागर आकाशवाणी के द्वारा प्रसारित किया जाता है।

फिर डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से निकलने वाली पत्रिका ‘ईसुरी’ में कान्तिकुमार जैन जी ने मनोज जी से यह कथा छापने के लिए मांग ली। 8/90-91 के अंक में इसे छापा और इसकी प्रति और पत्र भी मनोज जी को प्रेषित किया।

मुझे विश्वास है कि माधव शुक्ल  मनोज का यह कार्य बुन्देलखंड सदैव याद रखेगा...अब यह कथा धरोहर जो है
इन सबका... चूंकि मैं ही दर्शक था सो कह रहा हूं।

                                                                                                                                                                             आगत शुक्ल












बेला -तमाल
बुन्देली गीत नाटिका--- माधव शुक्ल मनोज

सागर नगर से 10 किलोमीटर उत्तर झांसी की सड़क पर स्थित गढ़पहरा में दांगी शासकों की राजधानी थी। वह पहिले गौंड शासक संग्राम सिंह के आधीन था जिसमें 260 मोजे लगे हुए थे। बाद में कछवाहों के दांगी राजपूतों ने उस पर अधिकार कर लिया। दांगी  शासकों ने पहाड़ी पर दुर्ग को निर्माण कराया।


दांगी लोगों के पराभव के बाद मराठों ने गढ़पहरा से हटकर सागर में राजधानी स्थापित की। पहाड़ी के ऊपर शीशमहल के भग्नावशेष हैं इस इमारत का निर्माण दांगी शासक राजा जयसिंह ने कराया। शीशमहल के पास पहाड़ी के नीचे पिसनहारी बावड़ी के पास एक समाधि है जो नटनी के नाम से प्रसिद्ध है।

यह नटनी कौन थी ? क्या नाम था उसका ? आज तक पता नहीं लगा। गढ़पहरा के इतिहास में सिर्फ नटनी का ही उल्लेख है। नटनी का एक सहयोगी साथी ढोल वादक भी था जो नटनी के नृत्य के साथ अपना ढोल बजाया करता था। नाटिका में दौनों के नाम बेला और तमाल रखे गये हैं जो काल्पनिक हैं।


बेला नटनी बहुत सुन्दर, अपनी नृत्य कला में पारंगत थी। धरती पर तमाल द्वारा बजायी गयी ढोल की ताल-धुन के साथ रस्सा पर अधर (आकाश में) नटनी बेला का करतब और उसका नाचना एक अद्भुत कला थी।

लोग कहते हैं बेला नटनी की आंखों में जादू था, जो सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। हम उसी कला सौन्दर्य की देवी बेला और जयसिंह की एक प्रेम कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं।

बेला -तमाल---बुन्देली गीत नाटिका

पात्र
1 उद्घोषक
2 गायक मंडली
3 राजा जयसिंह
4 बेला नटनी
5 तमाल ढोल वादक
6 राजा का मन्त्री
7 महारानी
8 महारानी का भाई
9 अन्य रानियां

(समाधि के चारों ओर बैठे हुए ग्रामीण नर नारी ढोलक, खंजड़ी इकतारा, बांसुरी और डमरू बजाकर गा रहे हैं)

     मोरी बेला तमाल।
     रस्सा पे चल रई हंस की चाल।
          मोरी बेला तमाल
हिरनी सी कुंदक रई रे,
चिड़िया सी कुंदक रई रे
ऊपर हवा में ऐसी लगे ऊ,
चंदनियां-छुटक रई रे।
होले-होले संभर कें डोले-
लेबे हिलोरें ऐसो -जैसो मोती ताल।
मोरी बेला तमाल।।

कैसो ढोलक धमका रओ रे,
कैसो नैना मटका रओ रे,
छैल छबीलो तमाल कौ मुखड़ा,
कैसो खूबई मुसका रओ रे।
गर्दन उठा कें, नेंचे सें ऊपर-
देखें रे सब कोऊ जी खों संभाल।
मोरी बेला तमाल।।
जयसिंह खों प्यारी हो गई रे,
राजा की दुलारी हो गई रे।
प्रेम-पियासी, प्रेम दिवानी,
मिसरी सी गुरीरी हो गई रे।
मौसम की धानी ओढ़े चुनरिया-
सब कोऊ के माथे लगा रई गुलाल।
मोरी बेला-तमाल।।
रस्सा पै चल रई हंस की चाल।

उद्घोषक गायन

सागर में हे तीन कोस पे, इक गढ़पहरा किलो बनो।
विन्ध्याचल को ऊंचों परबत, झाड़ी जंगल बड़ो घनो।
उत्तर मोती ताल झील में, मुतियन की छीपें-फूटें।
खोह गुफा में अनगढ़ देवी, दीप जरें नरियल फूटें।

दक्षिण हनुमान की चैकी, लाल पताका लहरावें।
घिरौ कोट, भैंरो कौ पहरा, पूरब गनपति मुसकावें।
शीशा  जड़ों महल अति सुन्दर, शीशमहल ऊ कहलावें।
कर सिंगार सब मिलें रानियां, जयसिंह कौ मन बहलावें।

गौर बरन सुन्दर छैः फुट की , रसिया जयसिंह सुख पावे।
शीशमहल के परदा भीतर, सुरग उतर के आ जावे।
खेले राजा खेल छुआ-छू, रात चांद की छैया में।
बीचों-बीच रानियों के संग-मारे-तीर जुदैया में।

उद्घोषक

राजा अपनी रानियों के साथ खेल-खेलता है और छिटकी हुई चांदनी में चांद की ओर तीर मारता है।
(सभी रानियां मिलजुर कर गाती हैं)

ऐंचना कौ खेंचना, लपेटा की पाग।
सोने का तुर्रा बुन्देलखंड़ी-राज।
कोऊ छू लो, मोरे लाल।
कोऊ छू लो मोरे लाल।।

एक रानी आंखे मीचे, एक पकरे गाल।
एक गावे गीत कोई, एक देवे ताल।
कोऊ छू लो, मोरे लाल।
कोऊ छू लो मोरे लाल।।

तिक-तिक धिन्ना, उचके मन हिन्ना।
इते तो आओ बिन्ना, बजाओ कोनऊं साज।
कोऊ छू लो, मोरे लाल।
कोऊ छू लो मोरे लाल।।

बुन्देलखण्ड में धूम मचाती हुई, अपना नृत्य कमाल दिखाती हुई नटनी बेला और तमाल एक दिन गढ़पहरा में आये।

उद्घोषक गायन

इक दिन सज कें बेला आ गई, गढ़पहरा कौ सुनो हवाल।
घुंघरू की छुम्मक-छुम-छुम पे, ढोल बजा कें हंसे तमाल।
ऊंचें खम्बा, बांध कें रस्सा, नटनी बेला नचन लगी।
आसमान सें बातें होवें, जनता सबरी जुरन लगी।

बुन्देलखंड कौ बड़ो अजूबा, खेल तमाशो जो करतब।
आसमान में नचे नर्तकी, दौर-दौर कें देखे सब।
असमान में घुंघरू छनकें, बेला कौ मन-मुसकावैं।
ब़ड़े नशीले वे तमाल के, इकटक नैंना दुलरावें।

लगे अफसरा जैसी बेला, यौवन सें भरपूर भरी।
ओ के प्रेम भरे सागर की, कोऊ खों नें मिली तरी।
नयना रतनारे-कजरारे, माथे पे बिंदिया-चमके।
खिेल कमल सी, ओठ-पखुरियां, कानों में झूमें झुमके।

चैली कलमी आम सरीखी, लंहगां सौ चुन्नट बारो।
लाज-शरम सकी चुनरी ओढ़े, लगौ डठूला-कजरारो।
बेला की चहुं ओर दुहाई, फिरी नाम सुन्दरता की।
जयसिंह के दरबार में पहुंची, नृत्य कला मादकता की।

उद्घोषक
(तब राज जयसिंह ने अपने प्रधानमंत्री को बुलाकर कहा)

राजा

बेला नटनी बहुतई सुन्दर, हमनें सुनी बड़ाई है।
गढ़पहरा में आकें ऊनें खूबई-घूम मचाई है।
मंत्री जी दरवान भेज कें, बेला नटनी बुलवाओ।
भरी कचहरी बीच चैक में, ऊ कौ करतब दिखलाओ।

मंत्री
जो इच्छा महाराज आप की, बेला अबहिं बुलाऊत हों।
बड़ौ रसीलो, मन भावन सौ, मुखड़ा ऊ दिखलाऊत हों।

उद्घोषक
दरबान, बेला और तमाल को दरबार में ले आता है। राजा जयसिंह बेला की भरी जवानी और उसके सौन्दर्य को देखकर मोहित हो जाता है। तमाल चैक में दो छोरों पर ऊंचे बांस के खम्बे गाड़ता है और बीचों-बीच रस्सा खींचता है तथा ढोल बजाने लगता है और नटनी बेला रस्से पर डोलने लगती है।

उद्घोषक-गायन
इन्दर की परियां शरमावे, लचके कम्मर थिरके ताल।
नट तमाल की धमकें गदियां ढोलक में से उठे उछाल।
छमछम-छमछम बेला नाचे, झूमे ढोल तमाल रे।
सभी सभासद कहें वाह रे, सचमुच बड़ो कमाल रे।

सभी रानियां गुमसुम देखें, बैठ झरोखे के अंदर
बेला की चितवन की जादू, चल गओ राजा के ऊपर
वाह-वाह कर बजा तालियां, मस्ती में राजा झूमें।
मदमाती अपनी नजरों से, बेला की चितवन चूमें।

(और फिर राजा ने बेला को अपने पास बुलाकर कहा-)

संवाद/राजा
ओ मृगनैनी चम्मक चैदस, मोरो प्रेम उजागर हे।
जो मुतियन कौ हार पेर लो, तुम पे जान निछावर हे।

संवाद/बेला
सोनो-चांदी हीरा, मोती, राजई खों शोभा देवें।
मैं गरीबनी अबला नारी, तुमसें का मांग लेवें।
नटकी कौ कां ठौर-ठिकानों, जीवन भर दुख-सहने खों
प्रेम पियारी कहूं मिले बस, चाहत बाखर रहबे खों।

संवाद/राजा
तुलसी जैसो बन कें पौधा, जानें कहां लगा गई हो।
प्रेम पियारी मोरी रानी, मन में आज समां गई हो।
शीशमहल के सम्मुख तुम खों, पार पहाड़ी के ऊपर,
अच्छी-पक्की बाखर दे दई, हंसी खुशी रहबे भीतर।

शीशमहल के सामने उस पार पर्वत पर बनी बाखर में बेला नटनी रहने लगी। प्रातः दुपहर सांझ राजा की नजरें बेला नटनी की बाखर निहारने लगी।

उद्घोषक-गायन
शीशमहल सें देखे राजा, बेला की बाखर न्यारी।
छेहरी दुआरे झांके बेला, ऊंसई-सींजे-फुलवारी।
हाथ झुला टकटकी लगा कें, होन लगी सेनाकारी।
जरीं-भुजीं, गुर्रा कें देखें, इते-उते, छिप कें रानी।
जान गई महरानी किस्सा, राजा काय हंसत नईयां।
लग गये नटनी सें अब नैंना, सो राजा बोलत नईयां।

यह सब जानते हुए एक दिन महारानी जी ने राजा के सम्मुख आकर अपनी पीड़ा व्यक्त की।

संवाद/महारानी
प्रान पियारे, नाथ हमारे, चैन नहीं आवे तुम-बिन।
दूर होत जाऊत हो हम सें, नेह घटत जावे दिन-दिन।
इतनी जल्दी छक गये हम सें, काय हमें टैरत नईयां।
जे नैंना रस के प्यासे हैं, काय तनक हेरत-नइयां।
नटनी सें मन लग गओ इतनों, हम सब माटी कूरा सी।
झार फूंक कें कहूं फंेक दो, ऐसी हो गई धूरा सी।

संवाद/राजा
मैं भौंरा, मनमौजी अपनो, कलियन के ढिग जे हे जो।
बेला जैसी कली कहां हे, ओके बिना नें रेहे-जो।

लगौ रहन देा मन बेला सें, मोरो नेह नहीं टोरो।
तुम सब सों सबरे सुख हें, जियरा काय जरत तोरो।
शीशमहल में कोऊ अब ने, आवे सब सें कह दईयो।
अपने-अपने रनवासों के, दुआरे सब लटका लईयो।

उद्घोषक-गायन
छाती में गढ़को सो खा कें, मन मसोंस कें महारानी।
लौट गई रनिवास में अपनें, अंखियन में भर कें पानी।
एक तरफ बिरहा की आगी, रनिवासों में बरन लगी।
एक तरफ बेला की कलियां, बाखर में से हंसन लगीं।

उद्घोषक
प्रतिवर्षानुसार मंगलवार को आषाढ़ी पूजा का उत्सव दुर्ग के भीतर कचहरी चैक में मनाया गया। जिसमें नटनी बेला का नृत्य विशेष रूप से आकर्षण का केन्द्र था। बंदनवारों, रंगीन आकृतियों एवं लाल पताकाओं से सुसज्जित दुर्ग सभी का मन मोह रहा था। तमाल की ढ़ोलक की गूंज, बेला की घुंघरू की झनक घरती और आकाश को चूमने लगी।

बरसात की पहली फुहार बूंदावारी से बुन्देली माटी की सोंधी सुगन्ध मस्ती बिखेरने लगी।
मौसम की उ़ड़ती धूल गुलाल सी होकर सबके माथे पर अपने आप लगने लगी। सुरा की प्यालियां लिये हुए राजा जयसिंह सिंहासन पर बैठा मस्ती में झूमने लगा। चारों ओर वाह-वाह की ध्वनि गूंजने लगी।

संवाद/राजा
वाह-वाह बेला तुम मोरी, सब कछु हो मन-मंदिर की।
आओ मोरे पास, तुम्हें दऊं सांसें अपने अन्दर की।
मैं तोरो, जा सब कछु तोरो, मांगो तुम्हें चाहने का।
जो तुम कह होऊ में अपनी, आज मिला हों हां में हां।

संवाद/बेला
राजन नेह तुम्हारो मिल गओ, जनम सुफल हो गओ हे।
मैं तोरी तुम मोरे हो गये, बाकी अब का रय गओ हे।

संवाद/राजा
मोरी कसम मांग लो बेला, जो मांगो वो ही देंहों।
धरी खजाने की जा चाबी, बिना दयें कछू नें रयहों।

संवाद/बेला
दर-दर फिरत नचत हों भारी, भीख सरीखी मांगत हों।
गुजर-बसर सों पेट के लाने, रस्सा झोली टांगत हों।
हुकम आप को सिर माथे अब, नई मानत तो बोलत हों।
दे दो आधो राजपाट फिर, रानी बन कें-बैठत हों।

संवाद/राजा
रानी का, पटरानी होकें, बेला राज करोगी तुम।
शीशमहल में उजयारे खों, मन कौ दिया धरोगी तुम।

उद्घोषक
राजा जयसिंह अपने शीशमहल से उस पार पहाड़ी पर देख रहा है। टकटकी लगाये ? ध्यान मग्न होकर, जहां बेला नटनी अपनी बाखर के सामने राजा को इशारा करती हुई अपनी फुलवारी सींच रही है।
( महारानी का प्रवेश)

राजा जू हो का रओं हे, आज रानियां रो रर्ह हें।
बेला नटनी सब के , आगे, पेनें कांटे बो रई हे।
पटरानी होवो चाहत हे, ऐसे भाव बड़े ऊ के।
भिकमंगू नटनी बाजारू, ऐसे दाम बढ़ेऊ के।
नैंन चला कें, रूप दिखा कें, ऊ नें वश मे कर लओ हे।

जादू की झोली में ऊनें, तुमें बांध कें धर लओ हे।

संवाद/राजा
संभल कें बोलो, महारानी तुम, दोष नें दे ओ बेला खों।
बेला जनम-जनम की साथिन, समझो प्रेम-झमेला खों।
प्रेम रंग हम रंग गअे दोऊ, प्रेम बिना जग ऊंसई हे।
ऐसो लगत कै, दो देहों में, एक प्रान हम इकई हें।

संवाद/महारानी (रो रोकर)
प्रेम भरे ई बोलारे खों, तनकई काट-छांट देते।
प्रान पियारे, हम रानिन खों, थोरो जहर बांट देते।
सौंतन हो गई बेला नटनी, करम फूट गओ मोरो रे।
सात भांवरों बारो पक्को, छूट गओ गठजोरो रे।

संवाद/राजा ( क्रोध में आकर)
हम दोऊन खों हसत देख कें, तुम सबरी अब जरन लगीं।
बेला की कुबड़ाई कर कें, अंखियन अंसुआ भरन लगीं।
रोने हे तो जा कें रो लो, रनिवासों में बैठे तुम।
बेर-बेर फिर मोरे आगें, लम्पा सी नें ऐंठो तुम।

उद्घोषक
राजा का आक्रोश सहकर विवश हो-महारानी अर्ज करती है और बेला को पटरानी बनाने के लिए शर्त रखती है।

संवाद/महारानी
अरजी हे महाराज हमारी इतनी सी आनाकानी।
नैंन लड़ा कें, छिप कें बेला, बनवो चाहत पटरानी।
बाजे-गाजे सें मैं आई, डोला में बन कें रानी।
बाजी जीत कें हो जावे अब, नटनी बेला महारानी।
ऊ परबत सें ई परबत लौ, छोड़ धरा अतपर आवे।
बखर सें ऊ शीशमहल लौ, रस्सा पे चल कें जावे।

उद्घोषक
राजा जयसिंह बेला के पास महारानी की लगाई गई शर्त का संदेश भेजता है। नटनी बेला उस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लेती है।
विन्ध्यायल के दो ऊंचे पर्वतों के बीचों बीच चट्टान के एक छोर से दूसरे छोर तक रससा बांध कर खींचा जाता है। नटनी बेला को बाखर से शीशमहल तक आने का यह का यह आकाशी रास्ता उपस्थित जन-समूह में सभी का दिल दहलाने लगता है।

उद्घोषक-गायन
गढ़पहरा में प्रेम पथ कौ, भरो तीसरो मेला रे।
कर सोलह सिंगार पिया खों चली सुहागिन बेला रे।
अपने प्रान निछावर करबे, सिर-माथे धर आई बाती।
सच्ची प्रेम परीक्षा देवे, बेला तुम हो गई-राजी।

फिर तमाल की ढोल-ढमाकी, बजन लगी डिमडिम डिमरू।
मन मुस्का कें, तन थिरका कें, चलन लगी ऊपर घुंघरू।
आधो रस्सा पार हो गओ, महारानी घबरान लगी।
शीशमहल में जा कें सिर धुन, रो-रो कें पछतान लगी।

उद्घोषक
अपना मन बहलाने के लिए महारानी जी पानदान उठाकर पान लगाती हैं। किन्तु यह क्या ? सरौता से सुपानी नहीं कटती। महारानी समझ गई। बेला नटनी जादूगरनी है। उसने आज सभी शस्त्रों की धार बांध दी है। इतने में महारानी का भाई आता है और अपनी म्यान से तलवार निकाल कर कहता है।

संवाद/महारानी का भाई
जो मौका पे काम नें आवे, ऊंसई कौ हे-ऊ-भैया।
धरती पे अब नटनी गिर हे, सब कर हें हा-हा-दैया।
मैं आऊत हों काट कें रस्सा, देख नहीं जीतन देहों।
मोरी बेन नें रोओ अब तुम, हरदम महारानी रेहो।

संवाद/महारानी
ठहरो मोरे प्यारे भैया, रस्सा नें कट हे तुम-सें।
पूरी जादूगरनी नटनी, रूक नें ऊ पाहे तुम सें।
धार बंधी हे हथियारों की,धार नें कोनऊं चल पे हे।
मैं जानत औजार कौन ऊ रस्सा जे सें कट-जे-हे।
तुम चमार की रांपी लिआओ, जे पे चले नें गुन-मंतर।
रस्सा कट-जे-हे-पे-तुम खों, कांटो लगहे नें कंकर।

उद्घोषक
तब महारानी का भाई चमार के घर से रांपी लाता है और रस्सा काटता है। बेला धरती पर गिरती है और लहू-लुहान होकर प्राणहीन हो जाती है।


उद्धोषक
प्राणहीन बेला धरती पे, बिजली जैसी चमक गई।
कोनऊ एक सुरग की देवी, सब के मन में दमक गई।
प्रान नाथ गोदी में ले लो, नभ में गूंजी बानी रे।
हरदम शीशमहल में रय हों, हो कें प्रेम दिवानी रे।
खनक गई हाथों की चुड़ियां, पिया मिलन की दूरी रे।
प्रबत नेचें पथरा उपर, बिखरी मांग-सिन्दूरी रे।
जयसिंह नें गोदी में लेकें, चूम लई बेला रानी।
जैसे सब कछु मिलौ आज, ऐसी बेला मुस्कानी।

उद्घोषक
राजा ने मृत बेला का सिर अपनी गोद में रख लिया और विलाप करता हुआ बोला-

बेला तुम बिन रयहों कैसें, अपनी अंखियां खोला तो।
जो जियरा अब जी हे कैसें, मोरी रानी बोलो तो।
हाय-हाय जो हो का गओ हे, कैसी अनहोनी हो गई।
मोरे आगे, मोरी बेला आज हमेशा खों सो गई।

उद्घोषक
इस तरह राजा का करुण विलाप देखकर राजा का ध्यान बदलने के लिए मंत्री कहता है-

राजन समझ गओ छल की कौ, इकदम बेला लुड़कपरी।
टूट गओ जो कैसें रस्सा, कैसें बेला रिरकपरी।
महारानी हत्यारिन निकरी, रस्सा उनने काटो हे।
बेला को संग नेह छुड़ावे, तुम खों जो दुख बांटो हे।

उद्घोषक
तब राजा गुस्से में आकर भौंहे चढ़ाकर मंत्री को आज्ञा देता है-

संवाद/राजा
हत्यारे खों खूबई बज्जुर-कर्री सजा मिलो चहिये।
सुख कोऊ कौ देख सके नें, ओ सें दूर रहो चहिये।
महारानी खों कैद करो तुम, ओ सें पथरा बिनवा दो।
भूखी, प्यासी रख कें ऊ खों परबर भीतर चिनवा दो।

उद्घोषक
राजा का ध्यान फिर निष्प्राण बेला की ओर जाता है। वह रोने लगता है और भावुक होकर कहता है।

संवाद/राजा (विलाप करता हुआ)

शीशमहल के सम्मुख तोरो, नेह चैतरा बनवा हों।
दिया भरें हों, जोत जरें हों, मन कौ मंदर तनवा हों।
संझा और सकारें रोजई, मन समझावे खों आहों।
जब तक जीहों, तब तक तोरो, मन मंदिर में बतयाहों।

मर जेहों पे संग ने छोड़ों, बरगद बन कें कस ल हों।
तोरी बनी समाधी ऊपर, मैं छाया बन कें रेंहों।
हनुमन-भैरों, अनगढ़ देवी, दुहराहें किस्सा बेला।
हर अषाढ़ के चारों मंगल, प्रेम भरो भर हे मेला।

हीरा, मोती ताल हिलुर है, शीशमहल फिर मुस्का हे।
हम दोऊन की प्रेम कहानी, मेला चलबे.. उसका है।

उद्घोषक
गढ़पहरा का मेला भरा हुआ है। गावों के नर-नारी बेला नटनी की समाधि पर फूल-मालायें चढ़ा रहे हैं तथा ऊदबत्तियां सुलगा कर गा रहे हैं।

मोरी बेला-तमाल।
रस्सा पे चल रई हंस की चाल।

जयसिंह खों प्यारी हो गई रे
राजा की दुलारी हो गई रे।

प्रेम पियासी, प्रेम दिवानी-
मिसरी सी गुरीरी हो गई रे।

मौसम की धानी ओढ़े चुनरिया-
सब कोऊ के माथे लगा रई गुलाल।
मोरी बेला-तमाल।

रस्सा पे चल रई हंस की चाल
मोरी बेला-तमाल।







मै आगत शुक्ल इन फोटोग्राफ के लिए इनका  आभारी  हूँ  धन्यवाद करता हूँ ...

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Sunday, 26 May 2013

बुन्देली के प्रतिनिधि कवि : मनोज


माधव शुक्ल मनोज हिंदी के परिचित कवियों में हैं और उन की हिंदी की कवितायें सुन का श्रोता भावित और प्रभावित होते हैं। वे आधुनिक हिंदी के अलावा बुंदेली में भी काव्य रचना करते हैं। बुन्देली में काव्य रचना वे पर्याप्त समय से करते आ रहे हैं और उन की बुंदेली रचनाओं से भी बुन्देलखंड के लोग परिचित हैं। उन की बुंदेली कविताओं का संग्रह ‘‘ कितनों गज इंदियारो’’ है। इस के तीन भाग हैं। पहले भाग का नाम ‘‘ कितनों गज इंदियारो’ ही है। दूसरे भाग का शीर्षक है ‘‘ धुनकी रूई पै पौआ’’ और तीसरे भाग का नाम है ‘‘ इकदम दिया से उजर गये’’।

माधव शुक्ल मनोज 
बुंदेली में उन्होंने लिखना बराबर चालू रखा है। उन की बुंदेली कवितायें भी उसी कोटि की हैं जिस कोटि की आधुनिक हिंदी की कविताऐं।  व्यंजना का माध्यम बदलने से बुंदेली कविताओं में बुंदेली परिवेश, संस्कार और भाव बुंदेलखंड के निवासियों के लिए और अधिक आत्मीयतापूर्ण हो जाता है। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति के सभी अंगों से उन का अच्छा परिचय है-लोकगीत, लोक नृत्य और लोक वाद्य इन सब पर गंभीरता से विचार करते हैं।  उन की एक छोटी किताब ‘राई’ पर प्रकाशित हुई है जो आधुनिक हिंदी गद्य की पुस्तक है। लोक कला के अनुरागियों द्वारा इस पुस्तक को सराहा गया है और इस पुस्तक से माधव शुक्ल ‘मनोज’ पर लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ है। लोक गीत और बुंदेली कवियों से भी उन का पर्याप्त संपर्क और परिचय रहा है उन की बुंदेली कवितायें उत्तम काव्य की कोटि में हैं।

उन की बुंदेली कविताओं से बुंदेलखंडी संस्कृति का भावात्मक परिचय मिलता है। वे लोक गीतों की शैली तो अपनाते हैं भावों के प्रस्तुतिकरण उन के अपने ही हैं। इस प्रकार वे बुंदेली के मौलिक कवि हैं यह और प्रसन्नता की बात है कि वे बुंदेली कविताओं में आधुनिक हिंदी के भावों से भिन्न स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करते हैं।

माधव शुक्ल मनोज ने काव्य रचना को बुंदूली में वह स्तर दिया है जो कोई अनुभूतिचेतन कवि ही दे सकता है इन कविताओं का वाचन करने वाले यह देखेंगे और ठहर कर विचार करेंगे तो उन्हें आहृलाद होगा।

बुंदेली बुन्देलखंड की अपनी उपभाषा है जिस में अनेक बोलियां हैं कवि ने सागर की बोली पर ध्यान दिया है और निस्संकोच सागर की बोली को ही ज्यों का त्यों रखा है। जनपदीय भाषाओं में जो रचनाकार है उनहें अपने क्षेत्र भाषा का व्यवहार करने में विशेष सुविधा होती है शुक्ल जी सागर के निवासी हैं ओर उन्होंने सागर की ही बोली को अपने काव्य का माध्यम बनाया है बुन्देली बाहर भी पढ़ने वाले अच्छी तरह समझ लेंगे क्योंकि जनपदीय भाषाओं में भेद के होते हुए भी अभेद का तत्व पाया जाता है काव्य के अनुरागी हिंदी की इस उपभाषाओं का भी उसी प्रकार स्वागत करेंगे जिस प्रकार आधुनिक हिंदी का करते हैं। जनपदीय भाषाओं की रचना जनपद निवासियों के लिए सीधे संवाद का माध्यम बनती है रचनाकार और पाठक दूरी का अनुभव नहीं करते यह आत्मीयता माधव शुक्ल मनोज आगे बढ़ाते हैं।

27 जुलाई 1990

त्रिलोचल शास्त्री

अध्यक्ष
मुक्तिबोध सृजन पीठ
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
सागर, मध्यप्रदेश

मनोज का कवि


माधव शुक्ल मनोज 

श्री माधव शुक्ल मनोज बुन्देली के नैसर्गिक कवि गीतकार हैं। उनकी हिन्दी कविता भी बुन्देली  की धरती पर खड़ी होती है और सम्पूर्ण  जातीय संस्कार ग्रहण करती हैं इसलिए मनोज की किसी भी रचना में मिट्टी की वह सौंधी सुगन्ध मिलती है, जो मनुष्य की मूल प्रकृति और नियति को गहरे तक व्याख्यायित करती हैं।

श्री मनोज के हिन्दी कविता संग्रह सिकता कण, भोर के साथी, माटी के बोल, एक नदी कंठी सी, नीला बिरछा, टूटे हुए लोगों के नगर में, जिन्दगी चंदन बोती आदि की रचनाओं में जीवन के विभिन्न  लम्बे अनुभवों का सार तुकान्त-अतुकान्त कविता में उतारेने की कोशिश की है। श्री मनोज की हिन्दी कवितओं को पढ़ने पर लगता है जब वे कोई बात बुन्देली में नहीं कह पाते या उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें हिन्दी में कहने में अधिक सुविधा होगी, तब वे हिन्दी की तुकान्त - अतुकानत कविता लिखने लग जाते हैं परन्तु मुझे हिन्दी कविताओं का स्वर भी बुन्देली गीत-कविताओं से बाहर नहीं लगता बल्कि यह कहना अत्युक्ति नहीं है कि 'मनोज' तो मूलतः बुंदेली बोली के कवि-गीतकार हैं। जहां बुन्देली शब्द काव्य की सरस धरती पर ऐसे बरसते हैं जैसे सावन की फुहार तन-मन को सुख देती है, भिगा देती है।

‘ जब रास्ता... चौराहा पहिन लेता है, चौकोर तुक्कों का संकलन है। कवि कहता है-ये चौकोर तुक्के अपनी नयी शैली-शिल्प में है। जिसमें कोई छन्द मात्राएं नहीं है। एक सीधी सादी कहन ही मौजूद  है-

अंधेरे में गेंहूं की बालों का उजाला
फसल रात ने चपके से रखली काटकर
दिया जगमगा कर अपना अब हिस्सा मांगा
सूरज ने किरण बो दी है-दिन के खेत मैं।

इस सीधी सादी कहन में प्रकृति की विपरीत व्यवहार दशा मनुष्य के आचरण को केन्द्र में रखकर कही गई है।
आज की स्थिति पर श्री मनोज संग्रह में कहते हैं 'आदमी सूखे लकड़ी का गट्ठर सा बंधा है' या 'खंडहरों में चालाक धुग्गू बैठे हुए हैं' अथवा 'आदमी तो आदमी, उसकी तस्वीर कितनी दोगली-आईना उसका भी है और चेहरा भी उसका'। 'भागती परछाईयों के सामने किस तरह पकड़ोगे अपने आपको'। आदि अभिव्यक्ति मनोज जी के लोक मानस की छटपटाहट लगती है।

श्री माधव शुक्ल मनोज बुन्देली संस्कृति के गहरे अध्येता हैं इसलिए बुन्देली लोक संगीत, लोक साहित्य और परम्पराओं को ध्वनियां उनके काव्य में सहज रूप से देखी जा सकती है। बुन्देली लोक धुनें मनोज जी की कविता को सांगीतिक आधार देती है और उन्हें गेयता की श्रेणी में बिठाती है। साथ ही शब्द परम्परा की सूत्रात्मकता को भी वागर्थ में अनुस्यूत करती चलती है।

श्री माधव शुक्ल मनोज के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता कि मनोज जी अपनी कविता में अपने कवि को कभी दोहराते नहीं हैं सदैव नये शब्दों में नई बात करते हैं यह विशेषता बुन्देली और हिन्दी दौनों में मौजूद रहती है। कविता अपने आसपास को सहज धटित व्यंजनाओं को अपनी कविता में बड़ी संवेदनशीलता के साथ पकड़ते हैं इसलिए' मनोज' जी सच्चे अर्थ में जन-जन के कवि हो जाते हैं। बुन्देली हिन्दी की सुदीर्ध परम्परा को साधते हुए श्री मनोज जी ने बोली और भाषा का अनार्लय के सेतु का निर्माण किया है यह संयोग किसी अन्य कवि-गीतकार में दुर्लभ ही है। इस परिप्रेक्ष्य में श्री मनोज जी का अवदान सदैव याद किया जायेगा। 

वसंत निरगुणे


कलाचर्या-संपादन

कलाचर्या-संपादन 
माधव शुक्ल मनोज

 लोकार्पण 





Sunday, 12 May 2013

विन्यास-कविता मासिक

विन्यास-कविता मासिक

माधव शुक्ल 'मनोज',
रमेशदत्त दूबे,
विजय कुमार,

पता-
विन्यास कार्यालय
परकोटा सागर मध्यप्रदेश

अगस्त 1962, अंक-एक, वर्ष-एक, प्रकाशित हुआ था



सम्पादकीय

विन्यास का प्रथम अंक आपके सामने हैं। 'विन्यास' को जो रूप हम देना चाहते थे, वह नहीं दे पाये। विन्यास के घोषणा पत्र में भी जिन विधाओं की हमने चर्चा की थी, उनमें से भी कुछ रह गयी हैं। उसके कई कारण हैं
'विन्या'स के संपादकों ने नयी कविता के कुछ प्रसिद्ध कवियों से उनकी कृति के लिए आग्रह किया। कवियों ने टके सा जवाब दिया कि पिछले वर्ष से उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा है।

एक नया कवि बिना कुछ दिये ( कुछ व्यापारिक पत्रिकाओं को कवितायें देने के अलावा ) निःशेष हो जाये यह दुख की बात है। होता यह है कि बिना काव्य-प्रतिभा के कुछ कवि काव्य रचना प्रारंभ कर देते हैं-कुछ निश्चित फिकरों और मुहावरों की दम पर। बार-बार उन्हीं मुहावरों और फिकरों का प्रयोग करते-करते कवि खुद कब ऊब जाता है। फलतः काव्य रचना बन्द हो जाती है।

कुछ रचनाकारों ने अपनी वे रचनायें पहुंचाई जो कई जगह से अस्वीकृत हो चुकी थी। उनके मन में सम्भवतः यह थाकि छोटे शहर की छोटी पत्रिका, रचना छप जायेगी। यह एक साहित्यिक बईमानी है।
जैसा कि होता है सोच-विचार कम और रचना (खास कर कविताओं की) अधिक, सो गद्य इस अंक को मिला नहीं।

अन्त में आशा और विश्वास के बल पर अगला अंक निकलेगा। आपकी सर्वश्रेष्ठ कृति आमंत्रित है।


अगस्त 1962

इस अंक में-

दूध नाथ सिंह
श्रीराम वर्मा
निर्मला वर्मा
अनामिका
प्रेमलता वर्मा
धारा मिश्र
मनोज


अपरान्ह -दूधनाथ सिंह
द्वन्द         -निर्मल वर्मा
दो कवितायें -रमेशदत्त दुबे
विशिष्ट कवि
सपना, मुट्ठियों में, फूल दर्पण, नीली झील, प्रभात का चंद्रमा @अबोध स्थितियों तीन कवितायें-मनोज
गांव की याद -मोहन अम्बर
हम तुम दो मीठे बैना -नीलोद कुमार
बसन्त -अनामिका
तुम्हारी बांहों में -प्रेमलता वर्मा
पुनर्जन्म -धारा मिश्र
भाषान्तर मराठी कवितायें
चन्दन -सदानन्द रेगे,
राह        -आरती प्रभु
-अनुवाद दिनकर सोनवलकर
चेलिया-एक विज्ञापन -श्रीराम वर्मा,
बबूल -दिनकरराव
एक कविता -गंगाप्रसाद विमल
एक कविता -बेंकटराव



सितम्बर 1962 अंक दो

प्रेमाभाव -आग्नेय
धाटी, वसंत और ‘ााम -राम विलास शर्मा
काव्य भूमिः संकलित टिपपणियां-विजयकुमार
                                    -शमशेर बहादुर सिंह
                                    -दूधनाथ सिंह (कल्पना130)
-गजानन माधव मुक्तिबोध( कालिदास जनवरी 1962)
विशिष्ट कवि -ओमप्रभाकर/नीलोद कुमार
डूब गये सूरज के लिए -ओमप्रभाकर
दिल्ली में एक दिनः आधुनिक शहर की एक प्रतिक्रिया
सहजिए क्षण
हर जलूस निकले मेरे ही द्वारे से
एक कविता -भागीरथ भार्गव
आस्था -अनुरागी
ओ कविता -देवब्रत देव
छाया-प्रेत -श्रीबाल पाण्डेय
एक कविता -चन्द्रकान्त देवताले
एक उर्दू कविता -मुबारिक है-मुनब्बर
काव्य रेखांकन
एक हस्ताक्षर और -राजा दुबे, संकलन रमेश कुमार तैलंग

नई कविता और कुछ प्रश्न-एक पाठक
पत्र


फरवरी अंक 1965


-वेंकटराव की पांच कवितायें
सब्र
रक्षा
प्रतिशोध
भविष्य
सोये हुए लोग
तुम
किस अज्ञात इशारे पर -दूधनाथ सिंह
फूंक दो -भारत भूषण अग्रवाल
प्रायश्चित -मणि मधुकर
ऐतिहासिक संदर्भ का दायित्व और आगामी पीढ़ी-गंगाप्रसाद विमल
कुतुबनुमां -राजकमल चैधरी
मैं चीड़ का दरख्त हूं   -विष्णु चन्द्र शर्मा
प्यार
ये उपलब्ध्यि -नारायणलाल परमार
एक कविता -प्रभाकर माचवे
एक कविता -नागानन्द मुक्तिकंठ

संपादकीय





Friday, 10 May 2013

सोनार बांगला देश-सम्पादन

माधव शुक्ल मनोज 
मानव का सब से महत्वपूर्ण अधिकार आत्म निर्णय का अधिकार है। आज बंगला देश में जनता के इसी अधिकार का बर्बरता पूर्ण नृशंस अपहरण और दमन किया जा रहा है।

मानवता की रक्षा के और विचार से सहानुभूति रखने वाले साहित्यकारों, कवियों का कर्तव्य है कि वे इस अन्याय के विरूद्ध आवाज उठायें और बंगला देश के लिये जूझती जनता को अपनी पूर्ण सहानुभूति दें।

इस समय देश के सामने बंगला देश, उसकी कराहती हुई गरीब शोषित जनता का दुख दर्द एवं अत्याधिक संख्या में आये हुए  शरणार्थियों की समस्या एक बड़ी जटिल समस्या है।

इन्हीं संदर्भों में अपने अपने विचारों को प्रकट करने लिए बंगला देश के पीड़ितों के सहायतार्थ हमने नगर के कवियों की कविताओं का एक छोटा सा संकलन 'सोनार बांगला देश' आपके समक्ष रखने का प्रयास किया है।

संकलन के सभी कवि-मित्र एवं साहित्यकार बंगला देश सहायता समिति सागर के समस्त सदस्य श्री विट्ठलभाई पटेल अध्यक्ष नगर पालिका सागर के आभारी हैं कि उनके ही विशेष सहयोग से यह सकलन (जिसकी आय बंगला देश के सहायतार्थ भेजी जायेगी ) आपके हाथों में पहुच सका है।

सम्पादक
माधव शुक्ल मनोज


सोनार बंगला देश- सम्पादक माधव शुक्ल मनोज 
कवि

श्री चन्द्रशेखर व्यास
 गोविन्द द्विवेदी
 कन्छेदीलाल अलबेला
 गोविन्द देवलिया
 ऋषभ समैया
 रमेश दत्त दुबे
 विट्ठलभाई पटेल
 लक्ष्मीनारायण चैरसिया
 निर्मल नीरव
 मनोज
 शिवकुमार श्रीवास्तव
 लक्षमण सिंह चैहान निर्मम
 ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी
 फूलचंद मधुर
 सलाम सागरी
 इकराम सागरी
 रामसिंह चैहान बेधडक
 हरिप्रसाद द्विवेदी
 प्रेमशंकर
 केवल जैन
 नवीन सागर
 जयनारायण दुबे
 योगेन्द्र दिवाकर
 श्री रघु ठाकुर


भूमिका

सोनार बांगला देश मेरे सामने हैं। सागर के सहकर्मी कवि मित्रों का एक सजग संकलन। भाई ‘मनोज’ और ऋषभ समैया ने इन रचनाओं को जुटाया है और जनता तक पहुंचाया।

कहते हैं जब-जब मिट्टी पर संकट आता है तब-तब मिट्टी के बेटे सबसे पहिले हांक लगाते हैं। वह मिट्टी फिर हंगरी की हो, वियतनाम की हो या बांगला देश की ! इसमें भारत की मिट्टी भी सम्मिलित है। जो सबसे पहिले स्वीकारे और आभारे, मां उसी की होती है। यह संदर्भ भी एक ऐसा ही रहा। भारत के स्वतन्त्रय संग्राम के लिए कभी अविभाजित बंगाल की मिट्टी से एक गीत फूटा था ‘‘ बन्दे मातरम’’! बंकिम बाबू ने इसे लिखा और पीढ़ियों ने इसे गाया। पीढ़ियां ही नहीं अब शताब्दियां भी इसे गायेंगी।

उस एक गीत का हम कलम जीवियों पर इतना कर्जा है कि हमें न जाने कितने जन्में तक यह कर्जा चुकाना पड़ेगा। भारत के कवियों को यह कर्ज अपनी वसीयतों में स्वीकार करना होगा। मेरा मन कहता है कि सारे देश में हम लोग बांगला देश की वेदना और संवेदना के लिए जो कुछ लिख रहे हैं व उसी कर्जे की किश्तों में जमा होगा। हम बांगला पर उपकार नहीं कर रहे हैं।

प्रस्तुत संकलन की रचनाओं का आक्रोश और तेवर समयानुकूल तो है हीं, वीरोचित और मानवोचित भी है। यह आवश्यक भी था।

‘‘ बांगला देश के संदर्भ में राजनीति, जितनी निर्मम, मानवीयचता जितनी गूंगी और राजनेता जितने बहरे सिद्ध हुए हैं वह बेजोड़ है। इस शताब्दी का यह ‘पाषाण पर्व ’ इन गूंगों बहरों औश्र निर्ममों को कभी क्षमादान नहीं देगा।’’
मेरी बात को काव्यात्मक रूप से पं. ज्वालाप्रसाद जयोतिषी ने इस संकलन में कह तो दिया है।


‘‘पंछी आज गाते हैं क्यों नहीं ?
  सूरज उग आया है
  चारों ओर उजियाला छाया है
  फिर भी सब चुप क्यों हैं
  जागरण की भैरवी उठाते नहीं
  गौरईयों-पड़कुलियों-सुग्गे औ
  कौवे औ मैना औ कोकिल
....सब मौन हैं।’’


बांगला में भैरव का रक्त-खप्पतर छलका और हमारी भैरवियों जाग गई हैं। अब ये सारे प्रतीक हमने बंगला की सम्पूर्ण मुक्ति को अर्पित किये हैं। बंकिम, श़रत, रवीन्द्र और अनगिन पहरूओं को हमने भी एक फौजी सलाम ठोका।

मैं जानता हूं इन रचनाओं में युद्धोन्माद नहीं है न ये बोल हमारी युयुत्सवा वृत्ति के कोरस ही हैं पर ये जो भी कुछ हैं किसी मंगल लक्ष्य की ओर बढ़ते आहत देश के आगे उचारे जाने वाले चारण-बोल तो हैं ही। जब भी बंगाल में सम्पूर्ण मुक्ति की प्रतिष्ठा होगी, हम सर्वाधिक सम्मानित होंगे। उन्हें उनका प्राप्य मिल, हमें हमारा। इस बीच का सारा संघर्ष वहां और यहां सीधी संघर्ष है।
हम चूकेंगे तब भी चुकायेंगे जरूर।

सबको बधाई।

बालकवि बैरागी

राज्य मंत्री
सूचना तथा प्रकाशन एवं पर्यटन

दिनांक 21.7.1977

Thursday, 9 May 2013

राजा हरदोल बुंदेला - नाट्य साहित्य

राजा हरदोल बुंदेला - माधव शुक्ल मनोज


'बुन्देली का आधुनिक नाट्य साहित्य' पुस्तक मै प्रकाशित राजा हरदोल बुंदेला नाट्य लगभग 3 4 पेज मै है

माधव शुक्ल मनोज


 





प्रकृति के तरुण गायक मनोज-निर्द्वन्द


प्रकृति के तरुण गायक मनोज-निर्द्वन्द 



नई दुनिया 29 अप्रैल 1962

साधारण कद, छरहरा शरीर, तीखे नाक नक्श, पीछे की ओर बिखरे छितरे लम्बे बाल और इनमें जो रूप रेखा उभरे वे हैं   30 वर्षीय कवि माधव शुक्ल  ‘मनोज’। ‘मनोज’  जी सागर के निकटस्थ ग्राम 'पनागर' की प्राथमिक शाला में शिक्षक हैं। हृदय के उदार संवेदलशील। धुन और लगन के पक्के अभावों से सदा जूझने वाले। प्रकृति के सहचर्य में अपने अभावों को मूल आनंद की उपलब्धि के प्रयासों में संलग्न इस तरुण कवि ने प्रकृति के रूपों को जिस संजीवता के साथ अंकित किया है उससे हिन्दी काव्य की श्रीवृद्धि हुई है। कॉंटों में भी जिनके बोल मस्ती से फूटे हैं, एक आस्था के साथ-

बेल पात्रिकाए टहनी में बेलों के
संग झूम रही
अड़न्नाथ केथों की टोली कांटो के 
बन चूम रही
माटी के ढेलों पर हैं गमार पाठे
का पत्ता
फैल रही यों अगल-बगल में अन-
गिनती कांटों की सत्ता
मंजिल तक चलने वालें के छाले
छिलकर फूट रहे
मैदानों में खड़े घास के डन्ठल सीधे
सूख रहे
जुभ जाने को सभी चाहते रो देना
मत भूल के
कांटे लगे बबूल के।

कांटों के बीच खिलने वाले फूल ही जीवन को उसके वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है-

दो बीघा जमीन के राजा मैं रानी
हूं खेत की
चमकदार पड़े पत्थर मैं चिनगारी
हूं खेत की
इसीलिए हर अधियारे पर फैला
मेरा राज है
आफत का तपता अंगारा मेरे
सिर का ताज है
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम मेरे
संगी साथ हैं
मेरे हाथों में जो तेरे वे दोनों ही
हाथ हैं
ओ मेरे जीवन के आंगन
कैसे यह चलती है धड़कन
हमने जाना तुमने जाना

जीवन के अन्धड़ में आस्था का दीप जलाने वाले कवि मनोज का जन्म सागर में 1 अक्टूबर 1930 को हुआ था। संघर्षों में पले और बढ़े-चाह होते हुए भी उच्च शिक्षा न प्राप्त कर सके और विवशता के साथ समझौता कर प्राथमिक शाला में शिक्षक हो गए। पढ़ने का संतोष न मिला तो पढ़ाने का बाना पहिना, बेबसी की लोरियां सुनी तो आस्था के गीत गाये और प्रकृति की गोद में जा लेटे। कैसा है यह विरोधाभास जो समझ कर भी अबूझ रहता है।

मैनें जब मनोज को पहली बार देखा था तो वे कटरा बाजार से पीपल की पत्तियों की जुड़ी लटकाये मस्ती में झूमते चले जा रहे थे साथ के एक कथाकार मित्र बोले-जानते हो वह कौन हैं? और जब तक मैं नाकारात्मक उत्तर दूं वे स्वयं बोले मनोज जी हैं यहां के तरूण कवि। पीपल की पत्तियां ले जा रहे हैं।

मनोज की कई रचनायें तब तक मैं पढ़ चुका था, रेडियो में भी उनका कविता पाठ सुना था और बिना देखे ही अपनी मान्यता बना चुका था। मित्र के कथन से चुभन हुई पर हंसकर बोला शायद आपके लिए ही न हो।
फिर मनोज जी से परिचय हुआ और तब मैंने जाना कि वह ठाठदार मनुष्य ही नहीं ठाठदार कवि भी हैं।

मध्यप्रदेश के तरूण कवियों में मनोज जी ने एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। तीस वर्षीय इस कवि ने ग्राम जीवन और ग्राम प्रकृति के चित्रों को जिस रंगीनी और खूबी के साथ चित्रित किया है वह विगत पच्चीस वर्ष के हिन्दी काव्य में बिरली ही देखने को मिलती है। श्री आदर्श का यह कथन उचित ही है कि ग्राम्य जीवन और ग्राम्य प्रकृति को मनोज ने अत्यन्त निकट से देखा है और गहरी अनुभूति के साथ उन्हें शब्द चित्रों में उतारा है। बुन्देलखण्ड के गांवों को उन्होंने वाणी दी है उनमें अनुभूति की ईमानदारी घोली है और कहने की सफाई भी। उनके गीत अनुभूतियों  को सहजता के कारण ही सरस बन गये हैं। 

इसमें संदेह नहीं कि मनोज जी ने सूक्ष्म दृष्टि पाई है और उनकी सहृदयता ने उन्हें सुरूचिपूर्ण अनुभूतियों की आस्थापूर्ण अभिव्यक्ति दी है। इसी से कवि के काव्य ने विस्तार पाया है।
वह हंसे ज्वार के खेत की कुटकी को ब्याह रचाते और बाजरा को प्रीत करते हुए अनुभव करता है।

प्रीत ज्वार से करे बाजरा, कुटकी
ब्याह रचाती है।
काचरिया का ढोल बजाकर बनरी
मूंग सुनाती है
पास खड़ा विरवा बबूल का नये 
बराती टेर रहा
उरदा पहुंनई करने को नये संगाती
हेर रहा।

भादों रसिया के आगमन पर कवि का हृदय हुलस पड़ता है और एक नया एल्बम खुल जाता है-

हरी भरी धरती दुल्हन रे भादों
रसिया दूला है,
जिनके संग संग झूम चला रे बन्दों
वाला झूला है,
लाज की मारी बेलें गुमसुम छप्पर
पर बल खायें रे
बदरारी किरणें धरती पर तृण
तक को दुलराये रे।

गांव की चांदनी से कवि मन में उमंग का अनुभव कर मन-मौजी प्राणों से गीतों का राग चला प्रकृति को नये ही रूप में देखता है। चांदनी की सत्ता का आभास उसे संवेदनशील बना देता है।

चमन-मगन जंगल में झींगुर
झंकार उठे,
गुपचुप चकोर मोन मन को संगार 
उठे,
बल खाती शरमायी चन्दा के
गांव की-
तरूओं के पातों पर अटक चली
चांदनी!


डॉ. रामरतन भटनागर के शब्दों में उनने ग्राम को अत्यन्त निकट से देखा देखा है।

'माटी के बोल' की भूमिका में भाई ब्रजभूषण सिह आदर्श ने मनोज जी के इन गुणों की व्याख्या की है। कहा गया है कि मनोज जी आस्था के कवि हैं। यथार्थ को उन्होंने विस्मृत नहीं किया किन्तु नये जागरण के प्रति उनकी दृढ़ आस्था ने प्रगतिवादी कवि की निषेघात्मक धारणा का आवरण दूर रखा है। कवि को दुख दैन्य ग्रसित कृषिकों और मजदूरों के आत्म गौरव और विश्वास पर अटूट श्रद्वा है और वह उन्हें खड़ित नहीं करना चाहता भले ही प्रगति और प्रयोगवादी उस पर नाक भी सिकोड़ें

तुम मेड़ मडे़यों के राजा, तम दुपहर सांग सकारे हो
तुम ही हो माटी के सोना तुम पानी 
हो बदरान हो
तुम सोन चिरैया विरछा का हो
फूले फले समैया
तुम चंदा के भैया, तुम सूरज के भैया!

यहां चंदा और सूरज के साथ भ्रातत्व स्थापित कर कवि ने किसान की कोमलता और कठोरता को जिस खूबी के संजोया है वह मानवोचित गुण है।

'मनोज' ने मानव स्वरूप की जिस देवोपम रूप की कल्पना की है या जिसे खेतों और खलिहानों में देखा हैं उसे अत्यन्त कुशलता से अंकित किया है। मनुष्य की कुरूपता का अंकन प्रकृति के चितेरे से संभव भी नहीं क्योंकि उसकी दृष्टि में में पतझड़ का सौन्दर्य बसन्त श्री से कम नहीं भले ही कुछ विज्ञजन इसे पलायन की ही वृत्ति मानें। 'मनोज' के लिए कविता कसक, विलास या तान मात्र नहीं क्योंकि उसकी दृष्टि में साहित्य का अर्थ हित के साथ है। यही कारण है कि वह  इसी सीमा के भीतर ही प्रगतिवादी और प्रयोगी दोंनों हैं।

सच पूछिए तो मनोज के काव्य को किसी वाद के कटघरे में रखना उनके साथ अन्याय होगा शायद इसीलिए कहा गया है कि छायावादी खेमों में मनोज की कविताएं भले ही स्थान न पाएं, प्रगतिवादी काव्यांतगत ग्राम्य जीवन के सुनिश्चित आकार में भी भले ही उनकी कविताओं को फिट न किया जा सके और प्रयोगवादी भी इन कविताओं को न स्वीकारें किन्तु चूकि इनमें चैपालों में गूंजने की शक्ति है वे ग्रामीणों की धरोहर बनने की क्षमता रखती हैं

लोक गीतों से कवि को प्रेरणा मिली है और उनकी अनेक कविताओं में लोक गीतों की आत्मा ध्वनित हो रही है। ग्रामीण जीवन के चित्रण के लिए परम्परागत लागक संगीत और लोक साहित्य से प्रेरण समीचीन है और माधव शुक्ल मनोज ने इस तथ्य को प्रमाणित भी कर दिया है।

इस संबंध में डॉ. भटनागर की मान्यता है कि भाषा की जनपदीय झलकियां हमें ग्राम की आत्मा के संपर्क में ले आती हैं और लोक गीतों की धुनें हमें एक बार भुला सा देती हैं और इसी को आदर्श जी ने अधिक कलात्मक ढंग से कहते हुए लिखा है ‘‘ कवि ने बुंदेलखंडी लोक गीतों से अपना तादात्म्य स्थापित कर कविता के माध्यम से गीतात्मक भाव धारा को लिरिकल बनाया है। उनकी भाषा के दर्शन, नाद सौन्दर्य, लयात्मक गति और इन्द्रधनुषी भव रूपों के कारण चटकदार बन पड़ी है।

मध्यप्रदेश के तरूण कवियों में मनोज जी से अनेक आशायें हैं उनके काव्य में जिस तन्मयता के दर्शन होते हैं यदि उसमें चिंतन का समावेश और हो जाये तो वह और अधिक उज्जवल रूप धारण कर सकेगा


निर्द्वन्द

नई दुनिया जबलपुर
29 अप्रैल 1962

राष्ट्रीय जनजागरण एकता यात्रा दल

साहित्यकार को जनमानस से जोड़ने वाले कवि मनो


साहित्यकार को जनमानस से जोड़ने वाले कवि मनो
नई  दुनिया 30 अक्टूबर 89 , साक्षात्कार- भोलाराम भारतीय


माधव शुक्ल मनोज हिन्दी और बुंदेली भाषा के जनप्रिय कवि है। उन्होंने रचनाकार को समाज की समस्याओं से रूबरू करके परिवर्तन का वाहक बनाने के लिए अभिवन कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत कवियों का दल गांवों-कस्बों में जाकर वहां के जनमानस को संदेश दे रहा है।

साहित्य कला एवं संस्कृति का न कोई संप्रदाय होता है और न ही कोई जाति। समाज को नई दिशा देने और चेतना जागृत करने में साहित्यकार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। पिछले कुछ समय से देश में साम्प्रदायिकता रूपी विष बेल ने अपने लतायें फैलाना शुरू कर दी हैं। हालत यह है कि एकता, भाईचारे और विश्वास के हरे-भरे पौधे मुरझाने लगे हैं। तथा लोग एक-दूसरे को अविश्वास की दृष्टि से देखने लगे हैं। ऐसे में साहित्यकार का मन उद्वेलित होना स्वाभाविक है।

राष्ट्रीय एकता कायम रखने के लिए बुंदेली एवं हिन्दी के इस लोकप्रिय कवि ने अभिनव राष्ट्रीय मौलिक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की। वर्ष 1988 में सागर नगर के कवियों, शायरों, गायकों, वक्ताओं, पत्रकारों, व कलाकारों को एकता यात्रा दल के रूप् में संगठित किया गया। दल के सदस्यों ने सागर जिले के लगभग 50 ग्रामों में समर्पित भाव से भाईचारे की भावनाऐं उजागर करने तथा जनमानस को प्रेरित करने का संकल्प लिया।

श्री मनोज का कहना है कि उन्होंने यह कार्य एक नेता की तरह नहीं, बल्कि एक निःस्वार्थ जनसेवा की भावना से किया है, तभी इस कार्य को राजनीति से परे एक भावनात्मक एवं रचनात्मक कार्य की संज्ञा दी गई हे। उनहोंने एकता यात्रा दल के सभी दलों के लोगों को एकता बंधुतव तथा देश प्रेम में अमन-चैन की बात करने के लिए आमंत्रित किया है।

इस राष्ट्रीय एकता यात्रा दल का पहला कवि सम्मेलन वर्ष 1988 के प्रथम दिवस में ग्राम , 'सुरखी' में हुआ। इसके बाद श्री मनोज के नेतृत्व में योजनानुसार अन्य गांवों, कस्बों में कवि सम्मेलन आयोजित किए गए।

श्री शुक्ल ने ग्रामीण अंचलों में ही कवि सम्मेलन आयोजित करने के औचित्य की चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में साम्प्रदायिक तनाव उपद्रव हिंसा की भयावहता बढ़ रही है और विभिन्न सम्प्रदायों में एक दूसरे से भयभीत होने की भावना प्रबल हो रही है।

यह स्थिति हमारी राष्ट्रीयता व सद्भावना को कमजोर बना रही है। गांवों में बसे लोगों का धार्मिक अंधविश्वासों की जमीन में जकड़े होना इसका मुख्य कारण है।  इसके अलावा राष्ट्रीय भावना को मजबूती देने वाले विचार भी उन तक नहीं पहुंच पाते हैं। इस खालीपन को दूर करने हेतु गांवों और कस्बों में जाकर राष्ट्रीय एकता सद्भावना कायम करने के लिए प्रयास करना जरूरी हो जाता है। एक कवि होने के नाते मैंने कवि सम्मेलनों के माध्यम से जनजागृति लाने का प्रयास किया है।

कवि श्री माधव शुक्ल मनोज ने बताया कि कवि सम्मेलन के पूर्व गांव के सरपंच और पंचों से सम्पर्क करना ही पड़ता है। उन्हें अपने दल का उद्देश्य बताकर कवि सम्मेलन के आयोजन के लिए रजामंद करने के बाद उनकी ही सुविधानुसार तिथि तय करना पड़ती है।

कवि सम्मेलनों में पढ़ी जाने वाली कविताओं के बारे में श्री मनोज ने कहा कि हमने विशेष रूप् से ओजस्वी कविताओं के माध्यम से ही प्रयास किया है कि व्यक्ति राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़े, सामाजिक कुरीतियों को त्यागे। साथ ही सभी को समाज के प्रति अपने कर्तव्यें का एहसास कराने व प्रत्येक-छोटे-मोटे हिंसक कार्य का समाज और देश पर कैसा प्रभाव पड़ता है यही बताने का प्रयास कविताऑ के जरिये किया जाता है।

श्री शुक्ल नगरीय और ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में किशोर अवस्था के छात्र-छात्राओं के बीच पहुचकर कवि सम्मेलन आयोजित कर रहे है।। इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एक अध्यापक होने के नाते मैं यह आवश्यक समझता है कि हम उन नए अंकुरों को साम्प्रदायिकता, वर्गभेद की धिनौनी छाप से बचाएं। अनुशासन, जागरूकता, देश-प्रेम, नई चेतना लाने के लिए माध्यमिक एवं हाई स्कूल के लिए छात्र-छात्राओं के बीच पहुंचकर प्रगतिशील राष्ट्रीय भावना की ज्योति प्रज्जवलित की जाए, आज के छात्र-छात्राएं ही कल के कर्णधार होंगे। इस भावना को लेकर नगरीय एवं ग्रामीण स्कूलों में भी दोपहर दो से सायं साढ़े चार बजे तक एकता यात्रा दल द्वारा कवि सम्मेलन आयोजित किए गए हैं।


एकता यात्रा यात्रा दल के कवि सम्मेलनों की खूबी यह है कि  इसमें राजनीतिक एवं सामाजिक दलों लोग सम्मिलित होने हैं। उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताया कि दल के कवि सम्मेलनों में किसी मंत्री, नेता, वक्ता, विधायक, पत्रकार अथवा समाजसेवी को मुख्य अतिथि के रूप् में आमंत्रित किया जाता रहा है। ग्राम संस्था की ओर से अध्यक्ष का चयन होता है। अब तक दिनकर राव दिनकर? श्रीमती अरविंद पाठक कणिका, श्री निर्मल, टीकाराम त्रिपाठी ‘रूद्र’ नवाब दूलहा, यार मुहम्मद ‘ यार’ अखलाक सागरी, देवीसिंह राजपूत, हर्षकुमार हर्ष, शिखरचंद जैन आदि काव्य पाठ कर चुके हैं।

नई  दुनिया 30 अक्टूबर 89 साक्षात्कार, भोलाराम भारतीय