Friday, 8 November 2013

छत्रसाल सम्मान 1989-माधव शुक्ल 'मनोज'

 छत्रसाल सम्मान

बुन्देलखण्ड परिषद् भोपाल

1989





बुन्देली कवि श्री माधव शुक्ल 'मनोज' के साहित्यक योगदान के लिए साहित्य सागर की ओर से

 बुन्देली कवि श्री  माधव शुक्ल 'मनोज' के साहित्यक योगदान
के लिए साहित्य सागर की ओर से

                                                    अभिनंदन पत्र                      दिनांक 7.10.1990
शशि सी शीतलता है तुममें, दिनकर जैसा घोष।
बुन्देली साहित्य मनीषी, माधव शुक्ल मनोज।।
सतत् साधना के प्रतीक तुम, कर्मठता की आन।
सागर को है भेंट विधि की साहित्यिक पहचान।।
बुन्देली स्वर दूर-दूर तक हैं तुमने पहुंचाये।
नई विधायें नये गीत के नये बोल बिखराये।।
मावस की रातों में जन-जब काले बादल छाये।
हर्षित करने जन मन तुमने गन्ना से दिन गाये।।
जीवन किया समर्पित सारा साहित्यिक धारा को।
नहीं किया स्वीकार कभी भी अंध स्वार्थ कारा को।।
राष्ट्र भावना से प्रेरित हो लिया एकता नारा।।
देश प्रेम की लहर जगाना ही उद्देश्य तुम्हारा।।
अनचाहे रोड़े पथ में तो आते है औ आयें।
किन्तु समय के दांव पेंच से कभी न तुम धबराये।।
सीधी सच्ची राह तुम्हें हरदम आती आई है।
इसीलिए तो कलम तुम्हें गंगा तट ले आई है।।
तुमसे खिली दिशायें पवन में महका शीतल चंदन।
करो बंधु स्वीकार तुम्हारा शत्-शत् है अभिनंदन।।

महासचिव                                         अध्यक्ष
टी. आर. त्रिपाठी रूद्र                       निर्मल चन्द्र निर्मल

अभिनन्दन पत्र 

अभिनन्दन माधव शुक्ल मनोज 
अभिनन्दन माधव शुक्ल मनोज


प्रणवानंद पुरस्कार 1999-माधव शुक्ल 'मनोज'

प्रणवानंद पुरस्कार 1999-माधव शुक्ल 'मनोज'
माधव शुक्ल मनोज को प्रणवानंद पुरस्कार
बुन्देलखंड साहित्य अकादमी छतरपुर द्वारा  स्वामी प्रणवानंद सरस्वती हिन्दी साहित्य पुरस्कार इस वर्ष कविवर माधव शुक्ल मनोज की कृति 'टूटे हुए लोगों के नगर में' देने का निर्णय हुआ।
अकादमी 14 वर्षों से बुन्देलखण्ड की संस्कृति साहित्य और कला को प्रकाश में लाने का कार्य कर रही है।
प्रणवानंद पुरस्कार-1999 छतरपुर

'टूटे हुए लोगों के नगर में



अक्षर आदित्य सम्मान 2000-माधव शुक्ल 'मनोज'

अक्षर आदित्य सम्मान 2000-माधव शुक्ल 'मनोज'
मध्यप्रदेश लेखक संघ
साहित्यकार सम्मान







ईसुरी सम्मान-1992 माधव शुक्ल मनोज

ईसुरी सम्मान-1992 माधव शुक्ल मनोज






शिव मंगल सुमन जी - माधव शुक्ल मनोज 

ईसुरी सम्मान 1992 




जब रास्ता चोराहा पहिन लेता है 



राष्ट्रपति सम्मान 1994 - माधव शुक्ल 'मनोज'

राष्ट्रपति सम्मान 1994
 इस वर्ष मध्यप्रदेश के शिक्षकों में राष्ट्रीय सम्मान हेतु श्री माधवशुक्ल मनोज का नाम भारत शासन ने घोषित किया है। वर्तमान में आप शासकीय शाला सदर नम्बर 1, सागर में कार्यरत प्रधानाध्यपक हैं आप ग्रामीण क्षेत्र की शालाओं में भी प्रधानाध्यपक के पद पर रहे हैं। लगभग 29 वर्षो से अपनी लगन एवं अध्यापन कार्य से आपने नई पीढ़ी के निर्माण का कार्य किया है। जहां-जहां जिन  ग्रामों में आप शिक्षक रहे वहां न केवल छात्रों को शिक्षण प्रदान किया वरन् समूचे समाज को आपने अपने व्यक्तित्व से प्रभावित किया है।
माधव शुक्ल मनोज

आपकी शिक्षण पद्धति बालकों को आस्थावान, स्वावलम्बी और श्रम के प्रति आदर और निष्ठावान बनाने वाली है। आपने विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता की भावना का बीजारोपण सदैव सहज ही किया है। श्रमदान से शाला भवनों का विस्तार, उद्यान, कुआॅ का निर्माण, कृषि उत्पादन का शिक्षण, सद्भावना यात्रा शिविर, स्वच्छता अभियान जैसे मौलिक अनेक कार्य हैं जो आपके शिक्षक के व्यक्तित्व को नये आयाम प्रदान करते हैं।

आपने प्राथमिक शाला मकरोनिया में भारत-पाक यु़द्ध के समय विद्यार्थियों के लिए फौजी ट्रेनिंग दी। सामने पहाड़ी पर युद्ध का प्रदर्शन और बंदूक की सलामी छात्रों द्वारा देकर जय जवान-जय किसान, के नारे को सार्थक किया था। तभी आपकी सुन्दर प्रभावशाली शाला व्यवस्था एवं नयी शिक्षण पद्धति को देखकर सन् 1967 में शिक्षा विभाग द्वारा सागर जिले की प्राथमिक शालाओं में से आपकी प्राथमिक शाला मकरोनिया आदर्श शाला घोषित की गई और संभागीय शिक्षक दिवस समारोह समिति सागर संभाग ने आपको प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया।

सन्1970 मैं प्राथमिक शाला रजाखेड़ी में प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं के छात्र-छात्राओं को आमंत्रित कर राष्ट्रगीत प्रतियोगिता (जनगणमन अधिनायक जय हे एवं वन्दे मातरम ) आयोजित की। जिसमें जिले की नगरीय एवं ग्रामीण शालाओं ने भाग लिया जिसकी रूपरेखा नियंत्रण पत्रिका मध्यप्रदेश शासन को भेजी गई थी। शासन ने इस योजना से प्रभावित होकर फरवरी सन् 1974 में इस योजना को ‘देश गीतांजलि प्रशिक्षण’ के अंतर्गत लागू किया था। इस प्रशिक्षण में भी श्री मनोज ने भाग लिया और फिर इस देश गीतांजली को अपने मौलिक ढंग से प्रस्तुत कर शासन की उस प्रशिक्षण योजना को गौरान्वित किया।
माधव शुक्ल मनोज, सम्मान 1994 

आपने प्रतिवर्ष शालेय उत्सवों पर आपने द्वारा किये गये मौलिक शिक्षण पद्धति, सांस्कृतिक रचनात्मक कार्यक्रमों की प्रगति, पत्रिकायें प्रकाशित की साथ ही नगर एवं ग्राम के गणमान्य व्यक्तियों, अधिकारियों एवं पत्रकारों के समक्ष अपने कार्यों को उजागर करते रहे हैं। वर्तमान में आपकी मौलिक शिक्षण गतिविधियां और योजनायें प्रभावशाली हैं जिनमें स्वच्छता अभियान, विज्ञान कोना, हरित क्रान्ति, भाषा सुधार, अभ्यास पाठ, समस्या निदान पद्धति, अतिरिक्त ज्ञान एवं लकड़ी की बंदूकों द्वारा फौजी शिक्षा, विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

एक सफल शिक्षक होने के साथ ही माधव शुक्ल मनोज मध्यप्रदेश के जाने-माने प्रख्यात कवि साहित्यकार भी हैं। आपने बुन्देली गीतों एवं हिन्दी की नयी कविता अर्थात् आधुनिक हिन्दी काव्य की दोनों विघाओं में भी उत्तम रचनायें की हैं जिनके कारण उनके साथ ही बुन्देलखण्ड को सम्मान मिला है। आकाशवाणी के साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से आपने राष्ट्र की भावनात्मक एकता के पक्ष को सबल किया है। श्री मनोज की राष्ट्रीय जन जागरण की कवितायें गावों की चैपालों में गूंज कर जनमानस को देश प्रेम का संदेश देती आ रही हैं।

सूचना प्रकाशन विभाग के द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के माध्यम से भी जन जाग्रति में सदैव योगदान किया है जो अभिनंदनीय है। श्री मनोज की 35 वर्षीय लम्बी साहित्यिक यात्रा में उनकी कवितायें कहानियां लेख देश की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है। इस तरह साहित्य जगत में भी श्री मनोज ने पूर्ण सफलता प्राप्त की है। आपकी सात-आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मध्यप्रदेश साहित्यकार एवं महाकौशल के साहित्यकार ग्रन्थों में आपका विशेष उल्लेख किया गया है।

वर्तमान में आप मध्यप्रदेश शासन, भोपाल के अंतर्गत आदिवासी लोक कला परिषद् भोपाल के मनोनीत सदस्य तथा मध्यप्रदेश कला परिषद् भोपाल द्वारा संभागीय उत्सव समिति सागर के भी मनोनीत सदस्य हैं आपको इस वर्ष मध्यप्रदेश लोक कला परिषद् भोपाल ने लोक कलाओं में बुन्देलखण्ड का लोक नृत्य राई पर मोनोग्राफ लिखने के लिए शोध कार्य दिया। परिषद् ने उसे राई नाम से प्रकाशित भी किया है।


आप एक उत्कृष्ट अध्यापक हैं और 29 वर्षों की निष्ठा पूर्ण सेवा दे चुके हैं। एक शिक्षक के रूप में आपने श्रेष्ठ स्तर बनाये रखा है। और आप शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे विकास की अद्यतन जानकारी रखते हैं। आपकी कक्षा के परीक्षाफल ही आपके दृढ़ संकल्प और निष्ठ के साक्षी हैं। आपने अपने छात्रों के लिए अपना ही एक पुस्तकालय खोला है। शैक्षिक कार्यकलाप या नए प्रयोगों की ऐसी कोई भी योजना नहीं हैं जिससे आप सबंधित न रहे हों। आपने सामजिक और सांस्कृतिक कार्यकलापों के जरिए आप अपने इलाके की सेवा करते आ रहे हैं। आपके स्कूल द्वारा एक शिशू चिकित्सालय और नेहरू बाल पुस्तकालय भी चलाया जा रहा है। जनता का सहयोग प्राप्त करके आपने पीने के पानी की समस्या का समाधान किया आपने अपने स्कूल के लिए दो कमरे तथा एक बरामदा बनवाया। आप एक कुशल लेखक और लब्ध प्रतिष्ठित कवि हैं। आपको मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् का सदस्य नामित किया गया है। आप एक आदर्श और निष्ठावान शिक्षक हैं और छात्रों, शिक्षकों और समाज के बीच आपको बहुत सम्मान प्राप्त है।

श्री मनोज को यह राष्ट्रपति पुरस्कार बहुत पहिले मिल जाना चाहिए था। श्री हरिनारायण चैबे  जिला शिक्षा अधिकारी जी ने यह उक्ति सच सिद्ध कर दी कि देर है’-अंधेर नहीं।

लोंक काव्य संध्या-माधव शुक्ल मनोज

लोक काव्य संध्या-माधव शुक्ल 'मनोज'

माधव शुक्ल 'मनोज' के 70 वें वर्ष पूर्ण होने पर लोक काव्य संध्या


पहिले-पहल का आयोजन

'मनोज' की रचनाओं का कवि कथाकार ध्रुव शुक्ल द्वारा पाठ

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वसन्त आगमन पर और निराला के जन्म दिवस पर 8 फरवरी 2011 को लोक कवि माधव शुक्ल 'मनोज' की रचनाओं का कवि कथाकार ध्रुव शुक्ल द्वारा पाठ और गायन किया गया। महाकवि निराला की रचनाओं का वरिष्ठ कवि राजेश जोशी द्वारा पाठ किया गया। आयोजन ‘पहले पहल’ रचनाकार विचार मंच’ द्वारा किया गया।

ध्रुव शुक्ल
इस कार्यक्रम में श्री ध्रुव शुक्ल ने पहिले निराला की रचनाओंका पाठ-गायन किया पश्चात् लोक कवि और अपने पिता श्री माधव शुक्ल 'मनोज' की हिन्दी और बुन्देली रचनाओं का सस्वर पाठ-गायन किया।

भोपाल के कला परिषद् के सभागार में उन्होंने अपने पिता के 70 साल पूरे होने के आयोजन की यादें ताजा कर दीं। वह आयोजन भी ‘पहले-पहल’ ने आयोजित किया था।

देश की कला राजधानी भोपाल में आयोजित, इस आयोजन में देश और प्रदेश के अनेक कलाप्रेमी, कलाकार, साहित्यकार और खासकर मनोज श्रीवास्तव और पंकज राग, गिरजा शंकर जी भी उपस्थिति उल्लेखनीय है।

ध्रुव शुक्ल ने कहा कि यहां मनोज श्रीवास्तव जी उपस्थित हैं वे मेरे पिता के मित्रों में से हैं और उनकी कविताओं को भी काफी पसंद करते रहे हैं।

समाज अगर ये सोचेगा कि उसने सिर्फ एक सरकार बना दी है कोई एक व्यवस्था बना दी है वो जाने उसका काम जाने..तो मेरे ख्याल से... ये समाज की एक सामाजिक कोताही है। समाज के हर समर्थ व्यक्ति को चाहे वो लेखक हो, कलाकार हो, पूंजीपति हो, समाजसेवक हो, स्वयंसेवी संगठन का व्यक्ति हो, वो जो भी हो, वो देखे कि ये जो मेरे पांव की जो जमीन है वो खिसकती है तो क्या होगा।
माधव शुक्ल 'मनोज'

इसलिए किसान को बचाने का जो धर्म है वह पूरे भारतीय समाज का है। इसलिए मैंने अपने पिता की बहुत सारी कवितायें इसलिए चुनी कि आप लोग सभी उनसे परिचित हैं एक बुन्देली के लोक कवि के रूप में, एक 'शीर्षस्थ कवि के रूप में मुझे गौरव है कि वे प्रतिष्ठित हुए और मैं उनकी कुछ कवितायें इसी बहाने से यहां ले आया हूं।

स्वाद स्पर्श, व्यंजनों के स्वाद, रंगबिरंगा पन, बहुरंगीपन, संस्कृति--- अगर हम इससे सब छूट गये और हम बस 'शीला की जवानी..' और क्या वो 'मुन्नी की बदनामी' में ही उल्झे रहे तब हम बहुत मुश्किल में फंस जायेंगे..और उस मुश्किल से निकलने के लिए बहुत जरूरी है कि हम सब अपने किसान की चिन्ता करें। इस कारण मैं ये कुछ कवितायें आपके सामने रखने की इच्छा कर रहा हूं और कुछ उस इतिहास की याद भी करना चाहता हूं कभी हम लोगों ने 1965-66 में  उस भूख और अकाल का हमने सामना किया था जब लाल बहादुर  शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री थे तब हमने बड़े गर्व से कहा था ‘जय जवान, जय किसान,’ क्यों कहा था कि हमको दौनों तरह के रणों में लड़ना है। एक को खेतों में जूझना है, भूख से लड़ना है और दूसरे को सीमा पर रण में लड़ना है। वहां भी एक दुश्मन घात लगाये बैठा है। चाहे वह हमारा विभाजित पड़ोसी हो और चाहे पंचशील से समझौते करने वाला एक दूसरा पड़ौसी हो, अन्ततः क्या हुआ इस हमारे सपने का ? बड़े-बड़े नेताओं को हृदयाघात हुआ, पक्षाघात हुआ, तो हम ये किस तरह का देश चला रहे हैं ? और फिर हमने हरित क्रांति और ‘'स्वेत क्रांति के सपने देखे... हम मशीने ले आये, हम हल की नोक को धरती की स्मृति से जोड़ना भूल गये। तो हमने जो बहुत सा दूध पैदा करने का संकल्प लिया,, हमने रसायनों से घरती को मुर्दा कर दिया। हमने यूरोप की आयातित नस्लों की गायें से अपनी सुरहन गैया बदल-- ली।  हमारी सुरहन गैया जो थी प्रकृति से लड़ जी लेती थी, अब हमने उस सुरहन गैया के बदले हम अजीब तरह की गायें ले आये जो बहुत सुकुमार हैं तो ऐसी गायों का हमने गौ-पालन किया और अपनी गायों को हमने मरने दिया। तो ये जो सब कुछ हुआ हमारे साथ तो ये आत्मालोचन का समय है।

आम तौर पर ये हो रहा है कि बहुत दोषारोपण हो रहा है। कि आपको यह कहने का अधिकार नहीं है क्योंकि आप तो यही करते रहे हैं तो आपको यह कहने का अधिकार नहीं है क्योंकि आप तो यही कहते हैं। तो आखिर ये भारत को चलाने का वास्तिविक अधिकार किसको है ? वो उन व्यक्तियों को है जो भारत के नागरिक हैं और जो किसान संस्कृति में भरोसा करते हैं। जिनकी ये इच्छा कतई ये नहीं है कि वन भूमि विदेशी लुटेरों के हाथ में चली जाये, जिनकी ये इच्छा कतई नहीं है कि किसान बहुत अल्पजीवी, कम उत्पादन वाले, छोटी जोतों वाले हो जायें ? भारत में एक समय खेती कौटुम्बिक होती थी, खेती का बंटवारा नहीं होता था। हमने जिस दिन से खेती का बंटवारा किया हमारा किसान छोटा होता गया। अकेला होता गया, कम उत्पादन में जीता गया, उसके उपर दुनियाभर के करर्जे लाद दिये..यह सब हमारे साथ... हमारी किसान संस्कृति के साथ हुआ है। और मैं ये कवितायें आपको सिर्फ इसीलिए सुना रहा हूं कि हम फिर उस अपनेपन की याद में फिर से लौट सकें...

हमनें जो अपनापन खोया है अपने गांव के साथ, उसको हम पा सकें...उसकी कुछ स्मृतियां हैं... एक लोक कवि की.

महाकवि निराला जी की कविता...अमरण भर वरण गान, वन वन उपवन उपवन जागी छवि खुले प्राण... के गायन के पश्चात लोक कवि माधव शुक्ल 'मनोज' जी की ही गायन शैली में उनकी कविताओं का पाठ और गायन श्री ध्रुव शुक्ल ने किया।

सूरज सोना सा बरसाये धरती बिरछा पात हो,
हंसे दूधिया चांद चंदनिया गोरी गोरी रात हो,
हरियाली की गोद चूमती नदिया बहे बहाव में
हरे भरे से गांव में...

चक्की के पाटों का राग उठा घर्रर-धर्रर,
माटी के घर में जगा धुंधले सुबह का पहर
खटपट सब बंद हुई सुनसान गलियां
गुमसुम हैं काटों में आशा की कलियां
बेला फूले आधी रात---

पिया बैठ लो
हरे हरे पातों की गहरी सी छांव, पिया बैठ लो

जय जय धरती मैया की,
खेतों की खलियानों की, मैडों की मैदानो की

तुम चंदा से भैया, तुम सूरज से भैया

मोरे अंगना में कंगना खनके रे,
मोरी नाचे राम दुलैया रे।

बड़ी रसीली कां गई रातें, कां गये वे दिन गन्ना से,
इते उते हम फिरतई रै गये हाथ उठा चैकन्ना से।

कूच को डंका रन खेतन बाजो
अरे भैया हो.. हाथन लो हथियार,
एक चलाओ प्यारे खेत में, दूजो चलाओ रन द्वार

लिपी साफ सुथरी खलिहाने
गिरी बिरगुवाई के भीतर
जैसे कोट फिर हो किसी किले का
उची उची खड़ी पचासी

बूंद गंगाजल पानी हो धरती धानी धानी हो
मन की बगिया फूले हो झूले फूल हिंडोले हो,
माटी भरे जवानी हो...

35 मिनिट के इस कथन, वाचन और गायन में प्रसिद्ध कथाकार, कवि, साहित्यकार श्री ध्रुव शुक्ल ने अपने पिता की सासों के स्वर में अपने पिता की परंपरा, विरासत और उनके हृदय के जाने-अंजाने दृश्य खोजने और महसूस करने का प्रयत्न किया। पिता की सांसों के उपजे संगीत और पिता की आत्मा के स्वभाव की याद को पुनः पाने, उसे जानने-मानने का प्रयास किया।

‘किसान धरती का नमक है’ नाम से लोक कवि माधव शुक्ल 'मनोज' की कविताओं की, कथाकार ध्रुव शुक्ल द्वारा प्रस्तुति और बसंत पंचमी 8 फरवरी 2011 को, भोपाल में पहले-पहल का आयोजन की डी.वी.डी. निर्मित हो, वितरित है।












Wednesday, 2 October 2013

मध्यप्रदेश के आधुनिक साहित्यकार -माधव शुक्ल मनोज


डॉ. ब्रजभूषण सिंह आदर्श ने मध्यप्रदेश के आधुनिक साहित्यकारों की एक सूचीबद्ध विशलेषण (भारतेन्दु युग से आधुनिक युग तक का ) किया। उसमें पेज 305 पर  माधवशुक्ल मनोज मो आधुनिक युग का कवि मानते हुए उनके साहित्य यात्रा और उनका परिचय अंकित किया है।
जीवन के अंधड़ में आस्था का दीप जलाने वाले तरूण कवि मनोज का जन्म 1 अक्टूबर 1930 को हुआ था। निद्वन्द जी के शब्दों में ‘संघर्षों में पले और बढ़े-चाह होते हुए भी उच्च शिक्षा न प्राप्त कर सके और विवशता के साथ समझौता कर प्राथमिक शाला में शिक्षक हो गए। पढ़ने का संतोष न मिला तो पढ़ाने का बाना पहिना, बेबसी की लोरियां सुनी तो आस्था के गीत गाये और प्रकृति की गोद में जा लेटे।‘
मनोज ने काव्य में ग्रामीण जीवन को जीवन्त बनाया है। ग्राम्य जीवन और ग्राम्य प्रकृति को उन्होंने अत्यन्त निकट से देखा है और गहरी अनुभूति के साथ उन्हें शब्द चित्रों में उतारा है। बुन्देलखण्ड के गांवों को उन्होंने वाणी दी हे। उनमें अनुभूति की ईमानदारी भी है और कहने की सफाई भी। उनके गीत अनुभूतियों की सहजता के कारण ही सरस बन पड़े हैं।
मनोज जी के बोल सशक्त हैं। इसका एक मूल कारण संभवतः यह है कि वे एक ग्रामशाला में अध्यापक हैं और स्वयं ग्रामवासी हैं। ग्रामीण जीवन को उन्होंने कल्पना की आंखों से नहीं देखा है वरन उसमें ही डूब कर उनकी अनुभूति ने अभिव्यक्ति पाई है। उनके काव्य की विशिष्टता ग्रामीण जीवन एवं प्रकृति की विस्तृत छवियां हैं जो उनके दिल और दिमाग दोनों पर गहरी उतर चुकी हैं।
यही कारण है कि वे आस्था के कवि हैं। यथार्थ को उन्होंने विस्मृत नहीं किया किन्तु नये जागरण के प्रति उनकी दृढ़ आस्था ने प्रगतिवादी कवि की निषेघात्मक धारणा का आवरण भी दूर रखा है। कवि को दुख-दैन्य-ग्रसित कृषकों और मजदूरों के आत्म गौरव और विश्वास पर अटूट श्रृ़द्धा है और वह उन्हें खंडित नहीं करना चाहता।
लोकगीत कवि की रचनाओं के संबल हैं और उनकी अधिकांश रचनायें उनके प्रभावित हैं। डॉ. रामरतन भटनागर का कथन है, भाषा की जनपदीय झलकियां हमें ग्राम की आत्मा के सम्पर्क में ले आती हैं और लोकगीतों की धुनें हमें एक बार भुला सा देती हैं। ‘कह सकते हैं कि कवि ने बुन्देलखण्डी लोकगीतों से आना तादात्म्य स्थापित कर, कविता के माध्यम से गीतात्मक भावधारा को लिरिकल बनाया है। उनकी रचना भाषा के दर्शन, नाद सौन्दर्य, लयात्मक गति और इन्द्रधनुषी भाव रूपों के कारण चटकदार बन पड़ी हैं।’
मनोज जी के चार काव्य संग्रह‘ सिकता कण‘, ‘भोर के साथी‘, ‘माटी के बाल तथा ‘एक नदी कंठी सी‘ प्रकाशित हो चुकी है। ‘एक नदी कंठी सी‘ में नर्ह कविता का नया परिवेश दृष्टव्य है।