Sunday, 14 April 2013

नीला बिरछा-1991, कविताएं

 नीला बिरछा


 कवि माधव शुक्ल की चुनी हुई कविताएं


नीला बिरछा एक काव्य संग्रह है  पिछले चालीस वर्षों की लिखी गई कविताओं में से लगभग डेढ़ सौ चुनी हुई कविताएं प्रकाशित की गई हैं, जिनमें बुंदेलखंड़ी, खड़ी बोली के सुमधुर गीत और कुछ आधुनिक शैली की कविताएं शामिल हैं।


 
नीला बिरछा 



1 मामुलिया

देश के काजें बांध कें फैंटा सज कें चल दो मामुलिया
मामुलिया तोरे आ गये लिबौआ ढुड़क चलो मोरी मामुलिया।

मामुलिया तोरो गांव हिमालय जहां सें आये लिबौआ।
रनभेरी बज उठी लराई कौ तोरो आव बुलौआ।
सजग करो। घर-घर के बीरन दश की प्यारी मामुलिया।
उमड़-घुमड़ कें बनकें बिजुरिया दमक चलो मोरी मामुलिया।


2 झर गई चम्पा झर गई बेला
कब सें देखू बाट पिया की लौट अबहु नहिं आये रे
झर गई चंपा, झर गई बेला, झर गये फूल कनेरा रे।
राह देखती, बाट जोहती
माधव शुक्ल मनोज-नीला बिरछा
देखू कौन डगरिया रे।
फरर-फरर पुरवैया बैरिन
खींचे रोज चुनरिया रे।

पोरा गिनगिन तडपूं तुम बिन
सूनी सेज सिजरिया रे

नहीं सुहावे पनघट कुईया
भरी न जाय गगरिया रे।
कटे न काटे कटतीं रतिया
दूभर हो गई बिंदिया रे।


3 हीरा बीनें कीरा

हीरा बीनें कीरा मुकुन्दी बीनें बेर
झुरझुरी को काटों लग गओ-
स्ब बगर गये बेर

कैसो आ गओ, अरे जमानो
हीरा हो गये कीरा।
मणि माला में आज मुकुन्दी
हो गये मिरचा-जीरा।
स्वारथ की धूनी पे जा कें
हो गए सब बमभोला
महनत को सब आज पसीना
हो रओ कोकाकोला।


4 बेला फूले आधी रात


खटपट सब बंद हुई, सूनसन गलियां।
गुमसुम है कांटों में, आशा की कलियां
पुरबा की लोरियां, सुगन्ध भरी थपकी।
अंखियन में धीरे से निंदिया ले मंहकी।
सुधबुघ सब भूल गई रतियों में देहिरा-
धरती की सेजों में सपनों में अटकी बात।
बेला फूले आधी रात।

धीरे से डूब गई चंदा की चांदनी।
फीकी सी बिखरी है तारों की रोशनी
गोरी सी बेला की दूध भरी पांखुरी।
जीवन में जीने की फूंक रही बांसुरी।
सिरहाने दियला रख, जाग रही घड़कन-
करवट ले हाथ की बजाती है चुटकी रात।
बेला फूले आधी रात।

दूर अभी पूरब में भोर का सितारा।
नदिया का घाट और चुप है किनारा।
नाले किनारे है टीटई का पहरा।
अम्बर का धरती पर अंधियारा गहरा।
चिड़ियों का मीठा सा नीड़ों में बंद गीत-
स्वर साधे बैठा है, मन में गीतों का प्रात।
बेला फूले आधी रात...


5 मन में उमंग भरे चैता के ढ़ोल बजे

मन में उमंग भरे चैता के ढ़ोल बजे।
ढ़पला-रमतूला संग बांसुरियां कूक उठी
पीलेे से मधुबन में ‘ााखायें पीक उठी।
मीठी सुगन्ध भरे महुआ के झौर झरे।
अमवा की अमियों में बैशाखी गीत भरे।
छोटे से गांव में भुनसारे, दिन डूबे-
खेतों खलियानों में गूेहूं के साज सजे
मन में उमंग भरे चैता के ढोल बजे ।

ऊमर की बात नयी, ‘ाहतूती बोल नये।
बेरी के मुरचन में मीठा रस घोल गये।
भिलमा की आंखों में टेसू का रंग भरा।
काठ के कठौता में सतुआ का स्वाद घुरा
घी चुपड़ी गांकर में दुपहर की भूख बुझी-
माटी के ढ़िमलों पर जीवन के गीत गुंजे।
मन में उमंग भरे चैता के ढ़ोल बजे।

इमली की फलियों खनकीं पक कुक करके।
फल निकले पीपल के पतझर में उठ करके।
ऐसे ही गांवन के जीवन में रस छलका।
फसलों की रानी, जब करती है मन हलका।
टिमक उठी टिमकी रे, मैया के मंदिर में-
थोड़ी सी मस्ती में सबके दुख-दर्द लजे।
मन में उमंग भरे चैता के ढोल बजे।


 वह छोटा सा गांव

वह छोटा सा गांव है

नदिया के उस पार बसा रे
वह छोटा-सा गांव है,
जहां-तहां टूटे छप्पर है
माटी की दीवार है।

जांता चक्की ओखल मूसल
सीके टंगे मियार है,
चिथड़ों से वह लदी अरगनी-
बेड़ा भीतर द्वार है।

हड़िया कुठिया और कठौता
रस्सी ओंगन चाक हैं
कंडा लकड़ी भरा मचेरा-
पौरों में अंधियार है।

खुटियों पर लटके हल बक्खर
फूटे बर्तन, खाट हैं,
हंसिया खुरपी गाड़ी-बैलों-
से पूरित घरबार है।

छुई से पुत द्वार के खम्बे
झुकी-झुकी दालान है
घर की एक पुतरिया स ीवह
घूंघट डाले नार है।

पिछवाडे़ बाड़ी गौशाला
अगल-बगल गलयार हैं
आंगन में पीपल का बिरछा-
परिजन पहरेदार हैं।

नंग-धुरग बच्चों के वे
तिल्ली वाले पेट हैं
सूखी सी रोटी से जिनको-
मिलता रहा दुलार है।

गांव के भईया भोले-भाले
खेतों के सिरताज हैं,
जिनका घिरा हुआ जंगल में
छोटा सा संसार है।



नीला बिरछा 1991 समीक्षा

ग्राम्यानुभूति में डूबा नीला बिरछा

नीला बिरछा 
नीला बिरछा एक काव्य संग्रह है जो पिछले दिनों मध्यप्रदेश के
अत्यन्त लोकप्रिय बुंदेली कवि माधव शुक्ल मनोज की षष्टिपूति पर प्रकाशित हुआ है। इस संकलन में उनकी पिछले चालीस वर्षों की लिखी गई कविताओं में से लगभग डेढ़ सौ चुनी हुई कविताएं प्रकाशित की गई हैं, जिनमें बुंदेलखंड़ी, खड़ी बोली के सुमधुर गीत और कुछ आधुनिक शैली की कविताएं शामिल हैं।

कवि मनोज 1947 से कविताएं लिख रहे हैं। एक शिक्षक के रूप में उनका आधिकांश जीवन सागर जिले के देहातों में बीता है। इस नाते उन्हें गांवों की पीड़ा, उनके सुख-दुखऔर साहस को निकट से देखने का मौका मिला। उनका समूचा काव्यलेखन ग्राम्यानुभूति में डूबा हुआ है। गांव की भोर से लेकर उसकी पूरी दुपहर, सांझ और उनके अंतर के मौन में कवि मनोज गहराई तक डूबे हैं। उनकी कविता में भोर इस तरह होती है।
नाजुक सी छोरी बुहार चली आंगन।
गडुआ में दूध दुहे घर की सुहागन।
गौरस की मटकी में गाये मथानी।
गांवों के जीवन की भोली कहानी।

माधव शुक्ल मनोज 

ये कविताएं भारतीय गांव की दिनचर्या को या कहैं
नदिया के उस पार बसा रे,
वह छोटा सा गांव है।
छुई से पुते द्वार के खम्बे
झुकी-झुकी दालान है,
घर की एक पुतरिया सी वह-
घूंघट डाले नार है।


केवल दृश्य ही नहीं गांव की तमामा आवाजें उनकी कविताओं में स्थान पाती हैं-जहां ‘धारा का संगीत संजोये नदिया गाती है।’ पौ फटते नदिया के तट गगरिया गाती है।’ फसलों पर हाथों की करताल, ढोल, मजीरों पर मुस्काती गांवों की चैपाल, सुबह-शाम खेतों में हा-हू की गूंज रैया, दिलरी, फाग, टिमकी की ताल पर नाचती बेड़नी के पगघुंघरू, अंगना में कंगना खनकाती राम दुलैया, बच्चों के पांवों की पैजनियों की छमछम, नाले किनारे रात को टीटई की आवाज, सुबह-शाम की सुमरनी सब एक साथ सुनाई देते हैं।
नयी नयी फसलों पर नाचे

हाथों की करताल हो।
ढ़ोल-मजीनों पर मुस्काए,
गावन की चैपाल हो
जीवन की बांसुरी बजाए
आशा अपने ठांव में
हरे भरे से गांव में




ग्राम्यानुभूति मैं डूबे...मनोज 
जहां एक तरफ वे आवाजें हैं वहीं गहरी पीड़ा का भाव है। मेहनत करने के बाद राहत की सांस लेने का मन है। ‘हरे हरे पांतों की गहरी सी छोव पिया बैठ लो।’

टेड़ी सी गलियों में
जीवन भर चलना है
अंधियारी दुनिया में दीपक सा जलना है
उठते ही रहना है जीवन भर पांव,
पिया बैठ लो।


इन कविताओं में मौसमों, ऋतुओं हवाओं, तीज त्याहारों सब सब का स्मरण है। वे अपना सारा खाद-पानी और अभिव्यक्ति की ऊर्जा, गांव की सौंधी सुगन्ध में ही पाती हैं-‘फागुन आ गओ, नवरंग छा गओ, हो गयी जा घूरा गुलाल पिया।’ मेहनत और मशक्कत की जिन्दगी जीते हुए कवि मनोज की राम दुलैया कह उठती है-
मोरी पूजा देश-धरम की है।
मोरी इच्छा सात जनम की है।
मोरी सच्ची सही कमाई पे-
मोरो ठन ठन बजे रुपैया रे।


प्रकृति के गांव में अलावा इन संग्रह की कविताओं मैं  कवि मनोज बुंदेली राष्ट्रीय काव्य धारा के कवि के रूप में अपना डंका बजाते हैं-‘ कूच को डंका रन खेतन बाजो, हाथन लो हथियार। एक चलाओ प्यारे खेत में दूजो चलाबो रन द्वार।’ लगता है यह कविता उस समय की है जब श्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय-जवान, जय किसानका नारा बुलंद किया था। कवि मनोज के राष्ट्रीय गीतों में माहुलिया, पंछी जगो सवेरे को और नेहरू जी की वसियत सातवें दशक में बहुत लोक प्रिय हुए। 1964 में उन्होंने पंड़ित नेहरू के देहावसन के बाद उनकी वसियत का बुन्देलखंड़ी बोली में काव्यानुवाद किया था और उसे गांव-गांव, शहर-शहर जाकर जनता के बीच गाया था।

पंड़ित नेहरू का स्वप्न जिस तरह इस देश में फलीभूत नहीं हुआ उसी तरह कवि मनोज की कविता में उस टूटे हुए सपने की पीड़ा उनके बुंदेली शब्दों में कुछ इस तरह झलकती है-
बडी रसीली कां गई रातें,
कां गये वे दिन गन्ना से।
इते उते हम फिरतई रै गए,
हाथ उठा चैकन्ना से।

...
ले ले खूब करौंटा काटी,
सब रातें भुनसारे खों।
खुली-खुली सी पोथी रे गई,
उलट गये हम पन्ना से।


इस चुनी हुई कविताओं के संकलन के तीन खंड हैं-पहिले खंड का शीर्षक है-बेला फूले आधी रात, दूसरा खंड-कां गये वे दिन गन्ना से और तीसरा कितने वर्ष जियोगी मेरी सोन जुही नाम से हैं।

पहिले और दूसरे खंड में क्रमशः खड़ी बोली और दूसरे खंड़ में क्रमशः खड़ी बोली और बुन्देली के गीत हैं। तीसरे खंड में उनकी कुछ आधुनिक हिन्दी कवितायें हैं। यहां शहर का जीवन कवि की काव्यानुभूतियों पर हमला सा कर रहा है पर यहां भी आधुनिक सभ्यता से पछाड़ सहते हुए भी गांव की स्मृति बनी हुई है।
बांस की पोर ने
जो पहना है
अज्ञात अंगुलियों ने छुआ है
न जाने मैं
किस बांसुरी के गांव में बजूंगा
किन-किन घेरों में
मेरा मौन
टूटेगा......झरेगा


पगडंडी पर चलते हुए यह अनुभूति कितनी सुन्दर, मोहक और पीड़ादायी है-
सूनी राह
कटीला जंगल
चलते-चलते
कभी-कभी मन
एक फूल से दुःख जाता है


यह काव्य चयन निश्चित ही कवि माधव शुक्ल मनोज के रचना संसार का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने एक आदर्श शिक्षक के रूम में भी अपने जीवन को सार्थकता दी है। उनकी एक अध्यापक की डायरी जैसी रचना भी पाठकों के समक्ष जल्द से जल्द आना चाहिए। इस डायरी के अत्यंत रोचक अंश स्फुट पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। एक कवि के शिक्षक के रूप में अनुभव बड़े काम के साबित होंगे, जिस तरह हर सर्जक को उसी तरह कति मनोज को भी यह अधूरापन सताता है-अभी तक कुछ गाया नहीं!अपना कुछ बिखेरा नहीं।



कि पूरी ग्रामचर्या को बड़े सूक्ष्म विवरणों के साथ अपने में बसाये हुए है। सिर पर गठरी ले जाती हुई ग्रामीण स्त्री, उसकी धीमी-धीमी चाल, सामने मैदान का सूनापन और उसकी व्यथा में गुंथी हुई पूरे गांव की व्यथा-जो नदिया के उस पार बसा है-

समीक्षक

प्रियंवद

पुस्तक -नीला बिरछा
कवि माधव शुक्ल की चुनी हुई कविताएं
मूल्य सौ रूपए
प्रकाशक प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली


एक नदी कण्ठी सी -1965

एक नदी कण्ठी सी


 

1 एक नदी कण्ठी सी





एक नदी कण्ठी सी
मटमैली मेड़ पर
पगडन्डी धूल पर
उस सूरज के घर
एक ताल सोने का
एक नदी कन्ठी सी।

एक गांव बहुत प्यारा है
सूरज के घर का
सबसे छोटा बेटा है
गेहूं की बालों का
मेहनती छोरा है
जो नदिया को हेर-घेर
कन्ठी सा पहिने है।

जिसकी गोरी ने
एक ताल सोने का
जो सुबह-सुबह छलका है
अपनी गागर भर
सिर पर बिंदिया सा पहिना है।

Friday, 5 April 2013

एक नदी कण्ठी सी-1965 समीक्षा


एक नदी कण्ठी सी (कविता संग्रह)

एक प्रतिक्रिया

मनोज को युवा रचनाकार चन्द्रशेखर व्यास का पत्र

पत्रिका-धूप, पेज न. 16, समीक्षक-चन्द्रशेखर व्यास




बहुत दिनों तक यह प्रश्न मुझे परेशान करता रहा कि अच्छी रचना अपने रचियता को अमर कैसे बनाती है प्रश्न का उचित समाधान मुझे तब मिला जब आपकी रचना एक नदी कण्ठी सी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
किसी भी लेखक की रचनाए उसके व्यक्तित्व जीने एवं विचारने के ढंग का स्पष्ट संकेत देती हैं और यदि रचनाओं पर चिंतन किया जाए तो लेखक की जीवनी प्याज की पर्तों की तरह खुलती चली जाती है इस पुस्तक से आपके बारे में जितना जान सका हूं लिख रहा हूं आपसे अनुरोध है  क़ि इस बारे में अपनी राय अवश्य दें।
पूरी पुस्तक संत्रास यादो की यातना और उदासी मुझे कुछ एंसे व्यक्त होने लगी-

हम पत्तियों की छांव
बालों में लपेट
चेहरों में भरे
परछाईयों में सूख जाते हैं।


पत्तियों की छांव पुरानी यादों के रूप् में चेहरे के झुर्रियों से अपनी एकरूपता स्थापित करे या करे पर परछाईयों में सूखने का भाव कुछ ऐसा लगा जैसे टूसू छाया में सुखाया जा रहा हो चटखती धूप में खिलने वाला एक मर्द फूल जो छाया में सूख कर औषधि बन जाता है ऐसी कई और औषधियां हैं जो छाया में सुखाये जाने पर अपने गुण के पीछे दवा को जितनी अधिक यातनाएं सहनी पड़ती हैं वह यातना एक अन्य कविता में सहज मौन के साथ व्यक्त हुई है ?

फट गया जब दर्द
अपनी आह से ही
सी रए हम
और क्या यह चुपचाप सूखने की प्रतिक्रिया नही
मैं अपने कक्ष में
झिलमिलाता जल रहा हूं।


पर यातना इस घुटन उदासी के संदर्भ में इसी संग्रह मंे छिपे हुए हैं पर उन्हें खोजने के लिए चिन्तन आवश्यक है

मेरे दूध बताशों के सपनों पर
खट्टी बूंदे टपक गईं
या फिर
मैं उजाले के किनारे
अपनी परछाईयों में
तुम्हारा नाम लिखना चाहता हूं


और यहां कवि का मन उस तुम से जुड़ जाता है जो अदृश्य होते हुए भी हर समय पास है हस तुम को स्वागत की कल्पना

तुम्हारे इंद्र धनुषी माथे पर
अपने वसन्त की धूल का तिलक
लगाने की सोच रहा हूं
और स्नेह आमंत्रण-
ओ मेरी सोन चिड़या
मेरे पास आ-


पर ‘ तुम, के अर्थ यहां तक ही नहीं हैं, वे विभिन्न संदर्भों में भिन्न र्थ और साकार पाते हैं आपका मन कितने निकट है तुम इस तुम के निम्न पक्तियों से ही स्पष्ट होता है

अपने आंसू की ओस
आंख से
कितने वर्ष रोयेगी
मेरी सोनजुही ?


यही हमदर्दी जहां दूसरे कवियों को भावनाओं में बहा ले जाती है वहां आप सहज ही भावनात्मक एकीकरण से अलग हट कर कह देते हैं-

तुमने
नीबू का बिरछा, रोपा था।


और यहा वर्तमान विलगाव भी स्पष्ट हो जाता है वह भी पूर्ण ईमानदारी के साथ-

एक नजर में दिख जाता है
हम हम में हैं
तुम तुम में हैं


इसी तुम के साथ आपकी श्रंगारिकता एवं आध्यात्मिकता एक जैसे शिल्प को लेती हुई व्यक्त हो गई है।
अपने प्रकृति वर्ण के बारे में कुछ कहना तो अपने भाषाधिकार को चुनौति देना है प्रकृति कहीं उपमेय है और कहीं उपमान


अधखुली मुदी कलियों को चीटियां
संघ-संघ
तने कुतर रहीं।
और
जवान दुपहर
और लंहगा की तरह घुमती हवा ,
अथवा-
फलता भुनसार
गदरानी दोपहर
पक कर टूटता नारंगी संध्या


पर ग्राम्य जीवन और प्रकृति के प्रति इतना तीव्र आकर्षण होते हुए भी आपका कवि हृदय बाहरी जीवन में निष्क्रिय नही है उसने अपने शहरी परिवेश में भी सुन्दर उपमाओं को खोज लिया है।

भोर कांच के गिलास में
पनी तरह आई
एक दूसरी कविता में....
मैंने इन सभी के हाथों में
आने वाली धूप की
बफयाती किरन प्यालियां
देने की सांत्वना दी


और इस विविध रंगों को अपने में समाहित करते हुए एक नदी कन्ठी सी एक अमर साहित्यक रचना बन पड़ी है इसमें आप स्तरही बौद्धिक चेतना के साथ अपनी बात कह डालते हैं।

जिंदगी से लिपटी
गूंगी धारणाऐं
बहुत टोटकेबाज हैं।
कहीं प्रबल विद्रोह सी है -
फाड़ देंगे खाईयों के मुंह
हम इन झुरमुटों की खाद देकर


पर वह रचनात्मक है ध्वंसात्मक नहीं और यह निश्चित रूप् से एक उपलब्धि है ?
कुछ रचनाओं में चैंकाने वाली संक्षिप्तता और विस्तृत भाव भूमि है जिसमें पाठक का मन आपके कवि मन से कब तादात्म्य स्थापित कर लेता है मालूम नहीं पड़ता, रचनाओं की गंभीरता इसे एक विशिष्टता प्रदान करती है और इसलिए एक विशिष्ट वर्ग ही इसे समझ सकता है सराह सकता है अपना सकता है भाषा जितनी सरल है विचार उतने ही कठिन और गहन-

आशा विश्वासों में
रखा एक सांचा है
जिसमें से आता है
एक नया आदमी


आदमी के भीतर एक और नये आदमी की उपस्थिति पर आपका विश्वास स्वतः सिद्ध हो गया है क्योंकि इस संग्रह में आपका व्यक्त व्यक्तित्व भोर के साथी एवं माटी के बोल के व्यक्त्वि से भिन्न है इन दो रचनाओं में शब्द दृश्य के साधन हैं पर एक नदी कन्ठी सी में शब्द दृश्यों का निर्माण करते हैं और दृश्य भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं।

कुल मिलाकर एक नदी कण्ठी सी बहुत पसंद आई।
बधाई स्वीकारिए मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि आपने मुझे इतनी सुन्दर रचनाऐं पढ़ने का सौभाग्य प्रदान किया और उस पर मेरे विचार जानना चाहे।

चन्द्रशेखर व्यास

माटी के बोल 1960-रचनायें

माटी के बोल

माटी के बोल 1962-समीक्षा



भूमिका  ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ सागर, 1962 

दृत गति से होने वाले विकास के इस युग में‘‘ माटी के बोल’’ समझना था समझा सकना एक दुस्तर कार्य है। विकलांग अनुभूति और बौद्विकता से बोझिल काव्यवृत्ति ही आज का साहित्य का आधार बनने का स्वप्न रचती हो तब सहज रूप से निःसुत ‘माटी के बोल’ ही उसका पथ रोक, सही दिशा’-निर्देश दे
सकते हैं। ऐसे माटी के बाल ही भारतीय संस्कृति और सीयता के सजग प्रहरी होते हैं और ग्रामीण भारत की आत्मा का प्रकाश फैलाते हैं।

हिन्दी साहित्य में सर्वागीण ग्रामीण -जीवन को परखने का प्रयास प्रेमचंदजी के कथा-साहित्य में सर्वप्रथम मिलता है। उन्होंने मूक ग्रामीण जीवन को वाणी दी और जीवन के अंतिम क्षणों तक उसके लिए जूझते रहे। उनकी मृत्यु के उपरान्त आधुनिकि हिन्दी-काव्य में कविवर सुमित्रानंदन पंत ने ‘ग्राम्या’ द्वारा काव्य का ध्यान ग्रामीण जीवन की ओर विशेष रूप से आकर्षित किया। पंत जी का यह कार्य महत्वपूर्ण रहा, इसमें संदेह नहीं, किन्तु माटी के बाल‘ग्राम्या’ में भी स्वाभाविक रूप से मुखरिन न हो सके। इसमें कवि ग्रामीण जीवन को बौद्धिक सहानुभूति ही दे सका और वह भी एक विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होकर। ‘ग्राम्या’ की आधिकांश कवितायें साम्यवाद के अत्याधिक निकट हैं, दुःखवाद से बोझिल तथा ग्रामीण जीवन के रोमान्सों का चित्रण करती हैं। ‘ ग्राम्या’ का महत्व इसलिए अधिक हैं क्योंकि यह प्रथम काव्य-कृति है जो नागरिक बौद्धिक चेतना का ग्राम्य जीवन की ओर होने वाले रूझान का संकेत देती हैं। वह प्रेमचंद के कथा-साहित्य के मूलाधार का काव्य में विस्तार पाने का सराहनीय प्रयास है आधुनिक हिन्दी काव्य के विगत पच्चीस वर्षे में अनेक कवियों ने ग्राम्य जीवन को अभिव्यक्ति दी है। महाकोशल एवं छत्तीसगढ़ के जिन कवियों ग्राम्य जीवन का अंकन किया है उनमें प्रमुख श्री माधव शुक्ल ‘ मनोज’ ( सागर) और बच्चू ‘जांजगीरी’ (बिलासपुर) हैं। उनमें से ‘ मनोज’ जहां अपने क्षेत्र के लोक गीतों एवं राष्ट्रीय जन-जाग्रति की भावना से प्रभावित हैं, वहां बच्चू जांजगीरी ने ग्राम्य प्रकृति को ही तन्मयता के साथ संवारा है। ‘ मनोज’ की कविताओं में भाव पक्ष प्रबल है तथा ‘बच्चू’ जांजगीरी का आग्रह कला पक्ष की ओर ही अधिक रहा हैं।

‘माटी के बोल’ मनोज जी का तीसरा काव्य संग्रह है जो ग्रामीण जीवन की अनुभूतियों की गीता है सच तो यह है कि ग्रामीण जीवन की सुकोमल भावनाओं के चित्रण के लिए कवि को माटी के प्राकृतिक गुणों से युक्त होना चाहिए। उसका हृदय माटी सा निर्लिप्त, उदात्त, स्निग्ध होना आवश्यक है जिससे वह सहज रूप से सबको अपने अंक में समान रूप से समेट सेके, स्नेह दे सके। ऐसा होने पर खेतों, खलिहानों चैपालों, झोपड़ियों तथा उनको गुंजारित करने वाले ग्रामीणों की रागात्मक छवियों को स्वरूप दे सकेगा। आधुनिक हिन्दी काव्य धारा में इसे दुर्लक्ष्य किया जा रहा है। इस दिशा में जो छुटपुट प्रयास किये भी गये उनमें प्रयासजन्य बौद्धिकता ही अधिक दिखलाई देती है। माटी के रंग तो सामाजिक यथार्थ के ज्ञान के साथ अनुभूति की सच्चाई से निखरते हैं और चित्रण की शक्ति से ही माटी की मूरतें संवरती हैं 
‘मनोज जी ’ की ‘ माटी के बोल’ सशक्त हैं। इसका एक मूल कारण संभवतः यह है कि वे एक ग्राम पाठशाला में अध्यापक हैं और ग्रामवासी हैं। ग्रामीण जीवन को उन्होंने कल्पना की आंखों से नहीं देखा है, वरन उसमें डूबकर उनकी अनुभूति ने अभिव्यक्ति पाई है। उनके काव्य की विशिष्टता ग्रामीण जीवन एवं प्रकृति की विस्तृत छवियां हैं जो उनके दिल और दिमाग दोनों पर गहरी उतर चुकी हैं। धरती उसके लिए सर्वस्व है और इसीलिए धरती माता की वह अर्चना करता है-

इस मिट्टी के ढेलों को, 
गांव गांव के गैलों की,
महनत की सब फसलों की-
गुमसुम खड़ी मड़ैया की!
जय-जय धरती मैया की!

नैराश्य की प्रतीक गुमसुम मडैया के दिन फिरने की आशा कवि को है-

हाथों में कल का अब सूरज नया है
समय का बदलेगा ठांव, नदिया नीचे बहे।

मनोज जी आस्था के कवि हैं। यथार्थ को उन्होंने विस्मृत नहीं किया, किन्तु नये जागरण के प्रति उनकी दृढ़ आस्था ने प्रगतिवादी कवि की निषेधात्मक धारणा का आवरण दूर रखा है। 

भोली सी सपनों में बैठी है आशा
कांटों में चलते हैं पांव, नदिया नीचे बहे।

जिस प्रेरणामयी भावात्मक मनोभूमि पर उसके पांव अंगद से टिके हैं वह अखंडित है।

नदी हमारी, खेत हमारा, गांव हमारा है
धरती के चप्पे-चप्पे पर पांव हमारा है
भुनसारे की किरन शीश पर चंदन सी दमके-
तूफानों में विजय हमारी, सांसों में पुरवैया रे!
हम सूरज के भैया रे।

और इसीलिए वह एक नया नारा देता है, ऐसा नारा जो राष्ट्रनेता पं. नेहरू के ‘ आराम हराम है’ सूक्ति की भावपूर्ण व्याख्या है-

धरती के बेटा हुंकार भरो रे।
सूरज के भैया भुनसार कारे रे
तुम सांसों की तानें गुंजार चलो रे-
फंूक चलो जीवन में अपनी बंसुरिया-
चले चलो, बढ़े चलो, अपनी डगरिया!

ऐसे अवसर पर कवि उनके आत्म गौरव और विश्वास को भी आंखों की ओट नहीं होने देता-

तुम मेड़-मड़ैयो के राजा, तुम दुपहर सांझ सकारे हो।
तुम ही हो माटी के सोना, तुम पानी हो बदरारे हो!
तुम सोन चिरैया बिरछा की, हो फूले-फले समैया
तुम चंदा के भैया!
तुम सूरज के भैया!

ऐसे ग्रामीण प्रकृति के भावपूर्ण चित्रों से ही कवि के हृदय का उद्धाटन होता है। ‘ मनोज’ जी की इन कविताओं में भावनाओं का निश्छल प्रवाह देखने को मिलता है। लययुक्त दंद में गतियुक्त चित्रण एवं भावपूर्ण कल्पना विद्युत धारा सी मचलती हुई चलती है-

बासन्ती रंगों में आशायें नाच रहीं
फसलों की पाती को पुरवैया बांच रही
तरूओं पर थाप लगी, गौरयां डोल रहीं
सांसों की बांसुरिया, मन में रस घोल रही
कुंजन-कछारन में केलों से भरी गहर-
फुलवा संग इठलाकर लूम रही हो!
पतली सी पुरवैया घूम रही हो!

कवि ने बुंदेलखंडी लोक गीतों से अपना तादात्म्य स्थापित कर कविता के माध्यम से गीतात्मक भाव धारा को ‘लिरिकल’ बनाया है। उनकी भाषा में कृत्रिमता नहीं है और वह जन भाषा के निकट है। संग्रह की अनेक कवितायें लोक गीतों के दर्शन, नाद-सौन्दर्य, लयात्मक गति और इन्द्रधनुषी भाव रूपों के कारण चटकदार बन पड़ी हैं। उनकी कविता में धरती के बेटों की आस्था और विश्वास का तथा उनके जीवन पक्षों का अंकन हुआ है। उन्होंने ग्रामीण जीवन की अपराजेय भावना को अभिव्यक्ति दी है-
गांव के राजा, हो तुम महाराजा
गेहूं को देश बना जईयो!

सूरज संगाती है, बादल की पाती है
फसलों का संदेशा पुरवैया लाती है
महनत कर हम तुमको अब मंजिल पाना है-
उठते ही रहना है, जीवन भर पांव-

छायावादी खेमें में मनोज की कवितायें भले ही स्थान न पायें प्रगतिवादी काव्यान्र्तगत ग्राम्य जीवन की सुनिश्चित चैखटे में भी भले ही उनकी कविताओं को ‘ फिट ’ न किया जा सके और प्रयोगवादी भी इन कविताओं को न स्वीकारें, किन्तु चूंकी इनमें चैपालों में गूंजने की शक्ति है वे ग्रामीणों की धरोहर बनने की क्षमता रखती हैं। इन कविताओं ने गांवों को लोक वाणी दी है और भाव और कला की नई भूमियों का स्पर्श किया

मैं तरूण कवि के इस नये काव्य संग्रह का अभिनंदन करता हूं

सिविल लाईन्स
सागर
12.3.1962
ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ 

भोर के साथी 1956-रचनायें

भोर के साथी 1956- 

हिन्दी कवितायें

माधव शुक्ल मनोज 

 

 

भोर के साथी 1956-समीछा

भोर के साथी 1956

माधव शुक्ल मनोज 

समीक्षक हनुमान वर्मा पत्रिका-वसुधा-जुलाई 1956 पेज न. 64

 


भोर के साथी ग्रामीण जीवन से संबंधित 21 कविताओं का संग्रह है जिसकी भूमिका डा. रामरतन भटनागर ने लिखी है। भूमिका में डा. भटनागर ने संक्षिप्त में हिन्दी साहित्य में ग्राम्य तत्व से संबंधित कुछ व्यक्तियों एवं रचनाओं का उल्लेख किया है और फिर उसी संदर्भ में उन्होंने ‘मनोज’ जी की रचनाओं का अभिनंदन किया है। जिन व्यक्तियों का डा. भटनागर ने उल्लेख किया है उनमें सुमित्रानंदन पंत, रमई काका, नागार्जुन और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ हैं। इनके बीच में मनोज जी की कविता-संग्रह में का मूल्यांकन करना उचित ही है। क्योंकि इस संग्रह में कवि ने जिस भाषा और शैली का प्रयोग किया है, वह अवश्य ही उपरोक्त साहित्यकारों के ही प्रकार की है जिसमें यदि कहीं दोष दिखाई देता है तो वह है कवि की साधन-सम्पन्नता की हीनता। कवि ने गांवों के चित्रों को गांवों की भाषा में ही रंग से संवारा है। कहीं कवि ने उसमें शहरातीपन नहीं आने दिया। उसकी शब्दावली ग्रामीणों की बोल-चाल की भाषा है और स्वर-लहरी भी प्रेषणीय तथा लोक-प्रिय। गांवों के जीवन तत्व और उनके सामाजिक संस्कार कही-कहीं बड़े मधुर रूपक बांधते हैं।
भोर के साथी  1956- माधव शुक्ल मनोज  

‘ हंसे ज्वार के कुंज ’ और ‘ भादों रसिया शीर्षक कविताओं में कवि ने प्रकृति को मानवी संस्कारों में बांध दिया है। कहीं-कहीं पर गांवों के लोकप्रिय स्वर और विश्वास कविता में फूट पढ़ते हैं। जैसे ‘ नील कंठ तुम नीले रहियो’ और ‘ दुख दूना रे ’। ग्रामीणों के दैनिक जीवन से संबंधित जो भी विषय-वस्तु कवि की आंख के सामने से गुजरी उसने उसे अपने गेय स्वरों में बांध दिया है।

 ‘ मनोज’ उदीयमान कवि है फिर भी उनमें सृजन प्रतिभा काफी दृष्टिगोचन होती है। डा. भटनागर ने अपनी भूमिका में जिस विश्वास मंगलाशा को प्रगट किया है वही हमारी भी है। उनका कहना है ‘‘ मनोज की काव्य साधना ग्राम्य जीवन की रंगीनी और तरूणाई के नये पनों की चित्रबेला की नई निधि हमें देती रहेगी, इस विश्वास और मंगलाशा के साथ...

हनुमान वर्मा


सिकता कण 1952 रचनायें

1952 photo
madhav shukla manoj

सिकता कण 1952-रचनायें 

माधव शुक्ल मनोज

प्रथम कविता संग्रह 

दुख भरे व्याकुल हृदय की
तुम सजनि मधु दामिनी हो
मौन मेरी विस्मृति में
तुम सजनि! मन्दाकिनी हो।




1
मैं किसी का चित्र लेकर,
इन दृगों में भर रहा हूं।
कल्पना का लोक मेरा,
हूं खड़ा पथ पर अकेला।

आज आमंत्रित किसी को,
में विजन में कर रहा हूं।
रोज प्रातः और संध्या,
के सलौने देख मेले।

इस धरा पर प्यार लेकर,
खूब पथ पर खेल खेले।
याद! ज्ीवन की कहानी ,
के लिखे थे गीत मैंने।

याद मुझको आ रहे हैं,
पा लिये थे मीत मैंने।
चित्र बनकर छा रहे जो
कर रखी थी प्रीत मैंने।

स्वप्न जीवन के अधूरे,
इस हृदय में धर रहा हूं।
में किसी का चित्र लेकर,
इन दृगों में भर रहा हूं।

 

Thursday, 4 April 2013

सिकता कण 1952,समीछा

सिकता कण 1952-माधव शुक्ल मनोज
प्रथम कविता संग्रह समीछा- ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी और शिवकुमार श्रीवास्तव  -सागर


 गीत और गायक
सिकता कण 1952-माधव शुक्ल मनोज
जब सत्य का सुन्दरता से संयोग होता है, तब कला का आविर्भाव होता है। कला सत्य की सौन्दर्यमयी अभिव्यक्ति है। यदि सत्य न हो तो कला की कल्पना नहीं हो सकती और सौन्दर्य न हो तो अभिव्यक्ति कला नहीं कही जा सकती।

जीवन की मंजिल पर चलते मानव हृदय में उठने वाली अनुभूतियां उद्वेलित हुआ करती हैं। उनकी नश्वरता को देख दार्शनिक उन्हें सत्य न मानेगा लेकिन अपने आविर्भाव के क्षण में मान हृदय को परिपूर्णतः आप्लावित करने की उनकी शक्ति ही उनका सत्य है और जब तक हमारी अनुभूतियों में यह सत्य मौजूद है उनकी अभिव्यक्ति कला हो सकती है।

मानव कितना भी भिन्न क्यों न हो उसने धर्म, जाति,वर्ण सामाजिक व्यवस्था आदि के कितने भी व्यवधान क्यों न खड़े कर लिये हों लेकिन जिस क्षेत्र में वह सम्पूर्णतः समान है वह है अनुभूतियों का क्षेत्र। कौन है जिसके हृदय में फूलों जैसे सुकुमार बच्चों को देखकर स्नेह नहीं उमड़ पड़ता? कौन है जिसका हृदय अनाचार को देख रोष ने नहीं फड़क उठता? किसकी आत्मा विद्रोह के लिए नहीं फुफकार उठती? और कौन है जिसका हृदय भूख से तड़पते मानव समाज को देख करूणा से चीत्कार नहीं कर उठता?

हो सकता है कि हमारी या उस अनुभूति की तीव्रता में उस या इस मानव की अनुभूति की तीव्रता से अंतर हो हमारे संस्कारों, वातावरणों ने हमारी इस या उस अनुभूति को कम या ज्यादा तीखा बना दिया है लेकिन यह एक अमिट सत्य है कि हड़डी और मॉस की तरह जिस प्रकार हमारे ‘ारीरों का गठन समान है उसी तरह अनुभूतियों की दृष्टि से हमारे मनो जगत का निर्माण भी एक सा ही है।

अनुभूति जहां शब्दों के रथ पर चढ़कर निकलती है वहां काव्य का सृजन होता है और जहां अनुभूति के वाहक शब्द संगीत की ताल पर अपनी गति संभाल कर चलते हैं, वहां गीति काव्य का अविर्भाव होता है।
अनुभूति की तीव्रता शब्दों की स्वरमयता, अभिव्यक्ति की सुकुमारता और संक्षिप्तता गीतति काव्य की मुख्य विशेषतायें हैं। मिश्री के ढेले का कण कण जिस तरह माधुर्य से ओत-प्रोत होता है, गीति काव्य की प्रत्येक कड़ी उस प्रकार अपने माधुर्य में परिपूर्ण होती है।

सिकता कण ‘‘मनोज’’ उपनाम से हिंदी जगत को आकृष्ट करने वाले सागर के तरूण गायक माधवप्रसाद जी शुक्ल की प्रारंभिक रचनाओं का संग्रह है। ‘‘मनोज’’ का संसार सुख-दुख पीढा - क्रीड़ा का संसार है। उनके संसार में जीवन के आनंद के साथ साथ उनकी तिज्ञता भी है। जीवन से सम्बद्ध ये सभी अनुभूतियां उसके काव्य में सहचर हुई हैं। पर इन सब के ऊपर वह प्रेम का साधक है और मस्ती का आराधक है।

सिकता कण में यही प्रेम और मस्ती के भाव मानो बोल उठे हैं। उसके प्रथम गीत से प्रकट है कि मनोज के हृदय में प्रेम की वेदना है। वह किसी प्रिय के चित्र को द्रगों में संजोए है।

 कल्पना का लोक मेरा।
 हूं खड़ा पथ पर अकेला।
 आज आमंत्रित किसी को
 में विजन में कर रहा हूं।
 एकाकी पन से क्षुब्घ होकर उसकी आत्मा चीखती है-
 आज किससे बात कर लूं,
 दूर हैं नक्षत्र मेरे।

और मिलन की सुधी करके वह सोच रहा है-
 कैसे भूलूं घनी छांव को,
 फूट कमी कब एक किरन।
 नयन  बावरे भर भर आये,
 जब  जब तेरे उठे चरन।

और विरह की इस वेदना में वह निवेदन करता है-
 श्याम घन में है तुम्हारी,
अर्चना की मौन घड़ियां।
क्षुब्ध नभ में है तुम्हारी,
सान्त्वना की मुग्ध लड़ियां।

और

दुख भरे व्याकुल हृदय की,
तुम सजनि मधु दामिनी हो।

विरह की इस व्यथा के तीव्रतर होते होते मनोज का स्थूल प्रिय विराट में विलीन हो चलता है। किसी अस्थि मांस की प्रेयसि की उसकी कल्पना प्रकृति प्रेयसी में लीन हो चलती है और उसका हृदय गा उठता है-
 आवाज तुम्हारी ही तो है।
 तुमने तारों में चंचल सी,
 झिलमिल मादकता है भर दी।
 मद भरी चांदनी रातों में,
 कंचन सी मोहकता धर दी।
 झिलमिला उठी जो पलकों में,
 तुम एक लहर हो बेसुध सी,
 भर गई नशा जो नयनों में।

इस लघु से विराट की ओर उन्मुख होता मनोज का प्रेम और उसकी लेखनी में अधिकाधिक माधुर्य और निखार लाता है-
 तुम तो सरिता हो एक लहर हो,
 यह कूल तुम्हारा अलिंगन।

और
 सच कहता हूं तुम्हीं एक जो
 मेरी प्यास बुझा सकती हो।
 जैसे मधुर गीतों की सुष्टि कराता है।

अस्तु, सिकता कण एक प्रेमी हृदय की वेदना के उद्गार हैं।
 कवि के स्वप्न फूल से कोमल हैं लेकिन वह कहता है-
 शूल में मेरी जवानी!
 चल पढ़ी ले आंसुओं में,
 जिन्दगी अपनी कहानी।
और भी
 प्रीत मेरी जिन्दगी से,
 जिन्दगी संगीत में है।

मनोज की यह प्रीति ओर यह जिन्दगी में आशा करता हूं कि कविता प्रेमियों को आनंद देगी। मुझे विश्वास है कि उनकी नवीन कृतियों के संग्रह कांटों के फल और इन्द्रजाल भी शीघ्र साहित्यकों के समक्ष प्रस्तुत हो सकेंगे। मैं मनोज के अधिकाधिक विकास  का आकांक्षी हूं।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी
सागर मध्यप्रदेश
12 फरवरी 52



पुस्तक समीछा


आत्माभिव्यक्ति की साध मानव हृदय की बहुत बड़ी साध है। अपने हृदय की दूसरे से कह लेने पर हृदय हल्का हो जाता है। दुख हो या सुख मनुष्य को उसे अपने हृदय तक ही सीमित नहीं रख सकता यही सृष्टि के संगीत का रहस्य है और आत्माभिव्यक्ति की यही आतुर आकांक्षा, यही प्यास काव्य का उद्गम है।

वैसे प्रत्येक व्यक्ति में अनुभूति का ज्वर रहता है। परन्तु प्रत्येक के पास अभिव्यक्ति की शक्ति नहीं होती। अपने आप को व्यक्त कर सकने की यह शक्ति ही कवि की अपनी विशेषता है जो उसे लोक से साधारण जन समुदाय से प्रथक करती है। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में वही दुख, सुख,आशा, निराशा, तृष्णा-परितृप्ति आकांक्षायें तथा सपने रहते है। परन्तु उन्हें वह व्यक्त नहीं कर पाता तो मुग्ध होता है, उसे लगता है कि अव अपने आप को व्यक्त कर सका है, कवि की रचना में उसे आत्माभिव्यक्ति का आनंद मिलता है। यही कतव का ‘स्व’-अपनी वैयक्तिक सीमायं लांध कर लोक के स्व को अपने में समाहित कर लेता है। उसका स्वान्तः सुखाय उसके पाठकों का शास्वत सत्य जितना अधिका होगा उस कवि की रचना उतनी ही लोक रंजक और प्रिय होगी और जो कवि अपनी भावनाओं के प्रति जितना ईमानदार होगा उसकी अभिव्यक्ति में यह सत्य उतना ही स्पष्ट और पूर्ण उतरेगा। कवि का हर गीत उसका अपना ही नहीं एक वर्ग, एक समाज, एक समुदाय का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है और सथ ही कुछ अंशों में समस्त मानव समाज का। यह बात ‘सिकता कण’ के कवि मनोज के साथ भी है उसने अपनी जो अनूभूतियां अपने इस प्रारंभिक गीतों में बांधी है वे उसकी कल्पना के लोक की झांकी है।। कई स्थानों पर यह झांकी बाकी है-रम्य है। मनोज के ये गीत एक तरूण के गीत हैं जो प्यार की मंजिल का पथिक है इसलिए सभी गीत प्रेम परक हैं। उसने-
रोज प्रातः और संध्या,
के सलौने देख मेले।
इस धरा पर प्यार लेकर
खूब पथ पर खेल खेले।

प्यार लेकर उसने जो खेल खेले हैं वे उसे सब याद हैं और उसके गीतों में वे खूब उतरे हैं।
याद जीवन की कहानी ,
के लिखे थे गीत मैंने।

इस जीवन की कहानी में हम उसके प्रिय को हर जगह छाया हुआ पाते हैं।
उसका यह प्रिय न तो ब्रम्ह है और न प्रकृति, प्रेयसी परन्तु उसके प्रिय में निखिल सृष्टि को रंग देने की ताकत है और यह ताकत न भी हो तो उसने कवि की दृष्टि को तो अवश्य बदल दिया है और इस तरह उसके लिए सष्टि भी बदल गई है-
स्वरित सावन की घटा में
ळी तुम्हारी बांसुरी है
सजग आंखां में छलकती
रूप की ही माधुरी है
वह स्वीकार भी करती है-
तुम एक लहर हो बेसुध सी,
भर गई नशा जो नयनों में।

मनोज के इन गीतों में आंसु कम हैं-कहिये है ही नहीं। एक उल्हास ही है-वह रात की माधुरी का पुजारी होते हुए भी प्रातः की आकांक्षा करता है-
प्राण गा दो गीत भोले
रात के मीठे स्वरों में
मुस्करा कर प्रात बोले

साथ ही वह चाहता है कि उसके प्रिय का स्वर द्वैत को मिटा दे-
गान में लहरें उठा दो
धरणि अंबर एक हो ले।

मनोज वह गायक है जो प्रिय के गीता गाता है और गीतों में प्रिय को पाता है। गीत और मनमीत में अंतर नहीं रह गया है उसके निकट-
मीठे स्वर में गा लेता हूं
क्योंकि रागिनी तुम्हीं मीत हो।
जीवन स्वर की एक ताल पर
चंचल सा प्रिय तुम्हीं गीत हो।

मनोज के गीतों में एक सादगी और तन्मयता है। स्वर में माधुर्य है। कई जगह उसने बड़े सलौने प्रयोग किये है। मुझे विश्वास है कि सिकता कण की कवितायें, कविता प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेंगी।
मनोज भविष्य की आशा

शिवकुमार श्रीवास्तव
सागर विश्वविद्यालय
16 फरवरी 52